ज़ब्त शराब की बोतलों की मात्रा तय सीमा से ज़्यादा होने की पुष्टि किए बिना आबकारी अधिनियम के तहत गाड़ी ज़ब्त नहीं की जा सकती: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम की धारा 47-A के तहत गाड़ी को ज़ब्त करने का फ़ैसला इस अनुमान के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता कि ज़ब्त की गई सभी बोतलों में शराब की मात्रा कानूनी सीमा से ज़्यादा थी। कोर्ट ने कहा कि ज़ब्ती की कार्रवाई करने से पहले संबंधित अधिकारी को भरोसेमंद सबूतों के आधार पर यह पक्का करना होगा कि ज़ब्त किया गया पदार्थ शराब थी और उसकी मात्रा पाँच बल्क लीटर से ज़्यादा थी; ऐसा पक्का यकीन ठोस सबूतों के बिना केवल अनुमानों पर आधारित नहीं हो सकता।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा राज्य सरकार द्वारा दायर क्रिमिनल रिविज़न याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। यह याचिका सेशंस जज के उस आदेश के खिलाफ़ थी, जिसमें स्कॉर्पियो गाड़ी की ज़ब्ती रद्द की गई थी। इस गाड़ी को छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत अपराध के सिलसिले में ज़ब्त किया गया था; आरोप है कि इसका इस्तेमाल शराब ढोने के लिए किया जा रहा था। पुलिस अधीक्षक (SP) की रिपोर्ट के आधार पर कलेक्टर ने अधिनियम की धारा 47-A के तहत गाड़ी ज़ब्त करने का आदेश दिया। आबकारी आयुक्त ने गाड़ी के मालिक की अपील खारिज की, जिसके बाद गाड़ी का मालिक सेशंस जज के सामने रिविज़न याचिका में सफल रहा।
राज्य सरकार का तर्क था कि गाड़ी में तय सीमा से ज़्यादा शराब ढोई जा रही थी, इसलिए कलेक्टर ने अधिनियम की धारा 47-A के तहत अपनी शक्तियों का सही इस्तेमाल किया। यह तर्क दिया गया कि एक बार जब यह साबित हो गया कि पाँच बल्क लीटर से ज़्यादा शराब ढोई जा रही थी तो गाड़ी की ज़ब्ती कानूनी परिणाम के तौर पर होनी ही थी।
कोर्ट ने गौर किया कि हालाँकि अभियोजन पक्ष ने देसी शराब, विदेशी शराब और बीयर की कुल 154 बोतलें ज़ब्त करने का दावा किया, लेकिन ऐसा कोई सबूत नहीं था, जिससे पता चले कि सभी बोतलों में मौजूद चीज़ की वैज्ञानिक या रासायनिक जांच की गई। कोर्ट ने पाया कि आबकारी सब-इंस्पेक्टर ने केवल 180 ml की आठ क्वार्टर बोतलें और 650 ml की बोतल - यानी कुल मिलाकर लगभग 2.09 लीटर शराब - की ही जाँच की थी। फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी, केमिकल परीक्षक या किसी सक्षम अधिकारी की ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं थी, जिसमें यह प्रमाणित किया गया हो कि बाकी बोतलों में भी शराब ही थी।
कोर्ट ने कहा कि बाकी बोतलों की जाँच न होने की स्थिति में यह मान लेना कि सभी 154 बोतलों में शराब थी और कुल मात्रा पाँच बल्क लीटर से ज़्यादा थी, कानूनी रूप से मान्य सबूतों पर आधारित नहीं था। अदालत ने माना कि गाड़ी ज़ब्त करना एक गंभीर कार्रवाई है, जिससे मालिकाना हक़ पर असर पड़ता है, इसलिए ऐसी शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए ज़रूरी कानूनी शर्तों को सख्ती से पूरा किया जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी पाया कि कलेक्टर और आबकारी आयुक्त ने सबूतों में कमियों पर ठीक से विचार किए बिना ही यह मान लिया था कि ज़ब्त किया गया सारा सामान शराब ही है, जबकि सेशंस जज ने रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों का सही आकलन किया।
इसके अनुसार, सेशंस जज के आदेश में कोई गैर-कानूनी बात या गड़बड़ी न पाते हुए अदालत ने राज्य की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (criminal revision) खारिज की और गाड़ी की ज़ब्ती रद्द करने वाला आदेश बरकरार रखा।
Case Title: State of Chhattisgarh v. Shravan Kumar Yadav @ Suraj [CRR No. 637 of 2018].