छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि अचल संपत्ति का मालिकाना हक ट्रांसफर करने वाले 'रिलीन्क्विशमेंट डीड' का रजिस्ट्रेशन होना ज़रूरी है। बिना रजिस्ट्रेशन वाला 'रिलीन्क्विशमेंट डीड' मालिकाना हक ट्रांसफर नहीं कर सकता, भले ही उसे गवाहों की मौजूदगी में बनाया गया हो।

कोर्ट ने इसी आधार पर रेवेन्यू बोर्ड के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की। रेवेन्यू बोर्ड ने बिना रजिस्ट्रेशन वाले 'रिलीन्क्विशमेंट डीड' के आधार पर किए गए म्यूटेशन (नाम बदलने की प्रक्रिया) रद्द करने का फैसला सही ठहराया था।

जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल संविधान के आर्टिकल 227 के तहत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। यह याचिका रेवेन्यू बोर्ड के 24 जून, 2026 के आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई। बोर्ड ने कमिश्नर का आदेश रद्द किया और SDO का आदेश सही ठहराया। यह विवाद संपत्ति के म्यूटेशन से जुड़ा था। इसमें 1981 में रेवेन्यू रिकॉर्ड से बुची बाई का नाम हटा दिया गया। यह कार्रवाई एक ऐसे दस्तावेज़ के आधार पर की गई थी जिसे कथित तौर पर उन्होंने याचिकाकर्ता नारायण सोनी के पक्ष में बनाया।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वह दस्तावेज़ 'रिलीन्क्विशमेंट डीड' नहीं, बल्कि पारिवारिक समझौता था और बुची बाई ने इसे बनाने की बात स्वीकार की थी। उन्होंने कहा कि उस दस्तावेज़ के आधार पर ही रेवेन्यू रिकॉर्ड से उनका नाम हटाया गया और लंबे समय से चले आ रहे कब्ज़े को सिर्फ़ इसलिए नहीं छेड़ा जा सकता कि दस्तावेज़ रजिस्टर्ड नहीं था।

कोर्ट ने पाया कि SDO ने बुची बाई की अपील पर गुण-दोष के आधार पर फैसला करते हुए पाया कि वह दस्तावेज़ 'रिलीन्क्विशमेंट डीड' था, जिसके लिए रजिस्ट्रेशन ज़रूरी था। साथ ही, सबूतों से यह साबित नहीं हुआ कि बुची बाई ने अपनी मर्ज़ी से उसे बनाया था। नतीजतन, SDO ने 1981 के म्यूटेशन आदेश को रद्द कर दिया और बुची बाई के कानूनी वारिसों के नाम म्यूटेशन करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि कमिश्नर ने अपील दायर करने में हुई देरी और इस बात पर विचार किया कि दस्तावेज़ 49 साल पहले गवाहों की मौजूदगी में बनाया गया। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि देरी पर कमिश्नर का विचार करना सही नहीं था, क्योंकि देरी को माफ़ करने वाले SDO के आदेश को रेवेन्यू बोर्ड ने 2004 में ही सही ठहरा दिया और वह आदेश अंतिम हो चुका था। रजिस्ट्रेशन के सवाल पर कोर्ट ने कहा कि कमिश्नर का विचार गलत है, क्योंकि भले ही लंबा समय बीत गया हो और गवाह मौजूद रहे हों, कानून की ज़रूरत यह थी कि जिस मामले में मालिकाना हक (टाइटल) ट्रांसफर किया गया हो, वहां 'रिलिनक्विशमेंट डीड' (हक छोड़ने का दस्तावेज़) का रजिस्ट्रेशन होना चाहिए।

कोर्ट ने कहा,

"लंबे समय के बाद भी, कानून की ज़रूरत यह है कि रिलिनक्विशमेंट डीड का रजिस्ट्रेशन होना चाहिए, क्योंकि उस डीड से मालिकाना हक ट्रांसफर हुआ है। साथ ही बिना रजिस्टर्ड रिलिनक्विशमेंट डीड के मालिकाना हक ट्रांसफर नहीं हो सकता, भले ही वह दो गवाहों की मौजूदगी में किया गया हो। इसलिए किसी रजिस्टर्ड रिलिनक्विशमेंट डीड के न होने पर रायपुर के एडिशनल कमिश्नर को याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर रिवीजन को मंज़ूरी नहीं देनी चाहिए।"

बोर्ड ऑफ़ रेवेन्यू के आदेश में कोई गड़बड़ी या अधिकार-क्षेत्र से जुड़ी कोई गलती न पाते हुए हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज की।

Case Title: Narayan Soni & Ors. v. Kumari Niramala Soni & Ors. [WP227 No. 1248 of 2026]

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