ज़मीन के विवाद में प्राइवेट प्रतिवादियों के कहने पर तहसीलदार दस्तावेज़ पेश करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

Update: 2026-07-18 04:00 GMT

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ लैंड रेवेन्यू कोड के तहत तहसीलदार के पास किसी प्राइवेट प्रतिवादी की अर्ज़ी पर किसी पक्ष को दस्तावेज़ पेश करने के लिए मजबूर करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ज़्यादा से ज़्यादा, तहसीलदार दस्तावेज़ पेश न करने पर किसी पक्ष के ख़िलाफ़ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकता है, लेकिन उनकी मर्ज़ी के बिना उन्हें दस्तावेज़ पेश करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। [2026 LiveLaw (Chh) 72]

जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें एडिशनल कलेक्टर के 30.05.2022 के आदेश को चुनौती दी गई। इस आदेश में तहसीलदार के पहले के आदेश को सही ठहराते हुए याचिकाकर्ताओं को अपनी ज़मीन से जुड़ी 'ऋण पुस्तिका' पेश करने का निर्देश दिया गया। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि तहसीलदार ने प्रतिवादी नंबर 3 की अर्ज़ी पर यह निर्देश जारी किया और उनके पास किसी प्राइवेट पार्टी के कहने पर दस्तावेज़ पेश करने के लिए मजबूर करने का अधिकार नहीं था। प्रतिवादियों ने विवादित आदेशों का समर्थन किया और तर्क दिया कि तहसीलदार ने याचिकाकर्ताओं को ऋण पुस्तिका पेश करने का सही निर्देश दिया।

कोर्ट ने देखा कि पक्षकार सिविल कोर्ट और रेवेन्यू कोर्ट दोनों में मुक़दमा लड़ रहे थे और उनमें से एक पक्ष सुप्रीम कोर्ट भी गया। कोर्ट ने कहा कि दस्तावेज़ पेश करने के लिए अलग से अर्ज़ी देना और तहसीलदार का उन्हें पेश करने का निर्देश देना छत्तीसगढ़ लैंड रेवेन्यू कोड के संबंधित प्रावधानों के बिल्कुल विपरीत है।

कोर्ट ने कहा कि भले ही याचिकाकर्ताओं को दस्तावेज़ जमा करने के लिए कहा गया हो, तहसीलदार के पास किसी प्राइवेट प्रतिवादी के कहने पर उन्हें पेश करने के लिए मजबूर करने का कोई अधिकार या शक्ति नहीं थी। ज़्यादा-से-ज़्यादा तहसीलदार दस्तावेज़ पेश न करने पर याचिकाकर्ताओं के ख़िलाफ़ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकता था, लेकिन उन्हें अपनी मर्ज़ी के बिना दस्तावेज़ दाखिल करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।

कोर्ट ने कहा,

"भले ही याचिकाकर्ताओं को अपने दस्तावेज़ जमा करने के लिए कहा जाए, संबंधित तहसीलदार के पास किसी प्राइवेट प्रतिवादी के कहने पर याचिकाकर्ताओं को उन्हें पेश करने के लिए मजबूर करने का कोई अधिकार या शक्ति नहीं है। ज़्यादा-से-ज़्यादा, तहसीलदार दस्तावेज़ पेश न करने पर याचिकाकर्ताओं के ख़िलाफ़ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकता है।"

कोर्ट ने आगे कहा कि अगर कोई ऐसी कार्यवाही चल रही होती, जिसमें मामले के निपटारे के लिए दस्तावेज़ पेश करना ज़रूरी होता, तो ऐसा आदेश कानूनी रूप से सही हो सकता था।

इसके आधार पर कोर्ट ने माना कि तहसीलदार ने 17.03.2021 का आदेश जारी करके कानून के खिलाफ काम किया और कलेक्टर ने उस आदेश को सही ठहराकर गलती की। कोर्ट ने दोनों आदेशों को रद्द कर दिया और रिट याचिका का निपटारा किया।

Case Title: Deepak & Anr. v. State of Chhattisgarh & Ors. [WPC No. 2932 of 2022]

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