30 साल पुराने वसीयतनामे पर वैधता की कोई स्वचालित धारणा नहीं, निष्पादन का कठोर प्रमाण आवश्यक: छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट
छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 90 के तहत 30 वर्ष से अधिक पुराने दस्तावेजों को लेकर जो वैधता की धारणा बनाई जाती है, वह वसीयत (विल) के मामलों में लागू नहीं होती। हाइकोर्ट ने कहा कि वसीयत को केवल उसकी प्राचीनता के आधार पर सही नहीं माना जा सकता, बल्कि उसका निष्पादन और सत्यापन विधि में निर्धारित कठोर प्रावधानों के अनुसार सिद्ध किया जाना अनिवार्य है।
यह निर्णय जस्टिस बिभु दत्ता गुरु ने दिया। कोर्ट ने कहा कि वसीयत दाता की मृत्यु के बाद ही प्रभावी होती है और उसके जीवनकाल में वह कभी भी निरस्त की जा सकती है। ऐसे में केवल यह तथ्य कि वसीयत 30 वर्ष से अधिक पुरानी है, उसकी प्रामाणिकता को स्वतः सिद्ध नहीं करता।
हाइकोर्ट ऐसे अपील मामले की सुनवाई कर रहा था, जिसमें अपीलकर्ता ने वर्ष 1958 की रजिस्टर्ड वसीयत के आधार पर भूमि पर अपने स्वामित्व की घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की। ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए वाद खारिज कर दिया कि वसीयत को कानून के अनिवार्य प्रावधानों के अनुसार सिद्ध नहीं किया गया। अपीलीय अदालत ने भी उक्त आदेश बरकरार रखा, जिसे चुनौती देते हुए मामला हाइकोर्ट पहुंचा।
हाइकोर्ट ने कहा कि वाद भूमि पर अधिकार का मुख्य आधार वर्ष 1958 की वसीयत बताया गया, लेकिन इस वसीयत को न तो भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 63 के अनुसार और न ही साक्ष्य अधिनियम की धाराओं 68 और 69 के अनुरूप सिद्ध किया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि वसीयत 30 वर्ष से अधिक पुरानी है, उसे साक्ष्य अधिनियम की धारा 90 के तहत विधिवत निष्पादित मान लेना कानूनन स्वीकार्य नहीं है। वसीयत को प्रमाणित करने के लिए गवाहों के माध्यम से उसका विधिवत प्रमाण आवश्यक है।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता ने दावा किया कि उसे अपने दादा द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर संपत्ति प्राप्त हुई और वह पिछले 40 वर्षों से भूमि के कब्जे में है। वहीं, प्रतिवादी जो अपीलकर्ता का चाचा था, उसने वसीयत की वैधता को चुनौती देते हुए कहा कि संपत्ति पैतृक है और वसीयत जाली है।
ट्रायल कोर्ट ने पाया कि वसीयत के निष्पादन और सत्यापन को लेकर कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। न तो गवाहों के बयान उपलब्ध कराए गए और न ही यह सिद्ध किया गया कि गवाहों के अभाव में साक्ष्य अधिनियम की धारा 69 के तहत वैकल्पिक विधि अपनाई गई। इसी आधार पर वाद को खारिज कर दिया गया।
हाइकोर्ट ने यह भी नोट किया कि भले ही वसीयत के लेखक और गवाह अब जीवित नहीं हैं, फिर भी अपीलकर्ता ने वसीयत को कानूनन सिद्ध करने के लिए आवश्यक प्रयास नहीं किए। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि केवल वसीयत का रजिस्ट्रेशन हो जाना, गवाहों के माध्यम से उसके प्रमाण की अनिवार्यता को समाप्त नहीं करता।
इन सभी तथ्यों के आधार पर हाइकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि नहीं पाई और अपील खारिज की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वसीयत के आधार पर अधिकार का दावा तभी स्वीकार किया जा सकता है, जब उसका निष्पादन और सत्यापन विधि के अनुसार पूरी तरह सिद्ध हो।