Wrestlers' Molestation Case | शिकायतकर्ता सालों तक चुप रहीं, बृजभूषण से अच्छे संबंध रखें; बयानों में विरोधाभास: कोर्ट

Update: 2026-08-10 13:40 GMT

दिल्ली कोर्ट ने महिला पहलवानों द्वारा यौन उत्पीड़न और छेड़छाड़ के आरोपों से जुड़े मामले में बीजेपी नेता और रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (WFI) के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह को बरी कर दिया। कोर्ट ने उनके लंबे समय तक चुप रहने, आरोपी के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने और बयानों में विरोधाभास को ऐसे हालात माना, जिनसे अभियोजन पक्ष के मामले पर उचित संदेह पैदा होता है।

राउज एवेन्यू कोर्ट के एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (ACJM) अश्विनी पंवार ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसी कई तस्वीरें थीं, जिनसे पता चलता है कि पीड़ितों ने सिंह को पारिवारिक कार्यक्रमों और शादी समारोहों में भी आमंत्रित किया।

कोर्ट ने कहा कि यह बात समझ में आती है कि WFI के तत्कालीन अध्यक्ष होने के नाते, अगर महिला पहलवान सिंह के खिलाफ शिकायत करतीं तो वे उनका करियर बर्बाद कर सकते थे; लेकिन यह बात बिल्कुल समझ से बाहर थी कि उन्होंने सालों तक उनके साथ अच्छे संबंध क्यों बनाए रखे।

कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 354, 354A और 506 (भाग-I) के तहत लगे आरोपों से सिंह को बरी कर दिया। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।

कोर्ट ने WFI के पूर्व सचिव विनोद तोमर को भी IPC की धारा 506 (भाग-I) के तहत लगे आरोप से बरी कर दिया।

अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि आरोप "सच होने के लिहाज से अधूरे" लगते हैं और "रटे-रटाए, अच्छी तरह से अभ्यास किए गए और सुनियोजित" प्रतीत होते हैं, खासकर तब जब शिकायतें इतने लंबे समय के बाद दर्ज कराई गईं।

कोर्ट ने कहा कि पीड़ितों का बयान विश्वसनीय नहीं था और अभियोजन पक्ष की कहानी पर उचित संदेह पैदा करने के लिए काफी था।

कोर्ट ने कहा कि चूंकि किसी ने भी सिंह के कथित कृत्यों के खिलाफ कोई औपचारिक शिकायत नहीं की या कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, इसलिए इस बात की संभावना बहुत कम है कि कथित कृत्य सच थे।

जज ने यह भी गौर किया कि पीड़ित उच्च अधिकारियों से भी मिलीं, लेकिन उन्हें भी कथित कृत्यों के बारे में नहीं बताया।

बयानों में विरोधाभास

एक महिला पहलवान के संबंध में जज ने पाया कि कथित अपराध की जगह और साल को लेकर उसके बयानों में विरोधाभास था। उन्होंने आरोप लगाया कि यौन उत्पीड़न की घटनाओं में से एक घटना 2016 में मंगोलिया में हुई। हालाँकि, कोर्ट ने गौर किया कि सरकार की निगरानी समिति के सामने दायर उनकी शिकायत में कहा गया कि यह घटना 2015 में तुर्की में हुई।

उन्होंने जिरह के दौरान कहा कि चूँकि उन्होंने कई सालों तक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई टूर्नामेंट में हिस्सा लिया था, इसलिए उनके लिए हर जगह का नाम और विवरण याद रखना बहुत मुश्किल था।

कोर्ट ने माना कि जिस जगह पर यौन उत्पीड़न की घटना हुई, उसे याद न रख पाना असामान्य व्यवहार था।

कोर्ट ने देखा कि घटना की जगह, देश और साल के बारे में गवाह के शुरुआती बयान में बदलाव अभियोजन पक्ष की कहानी के लिए नुकसानदेह था।

अक्टूबर 2017 की दूसरी घटना के बारे में कोर्ट ने पाया कि शिकायत और बयान में बताई गई तारीखों में अंतर था। साथ ही बताई गई तारीखों में से एक तारीख को सिंह ने साबित कर दिया कि वह दूसरे शहर में थे, जबकि आरोप यह था कि घटना दिल्ली में WFI ऑफिस में हुई।

पहली पहलवान का तीसरा आरोप यह था कि जनवरी 2018 में सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम में आयोजित रेसलिंग लीग में आरोपी ने उनके साथ छेड़छाड़ की थी। कोर्ट ने इसे अविश्वसनीय माना, क्योंकि आरोप के अनुसार यह घटना सबके सामने हुई और कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था। साथ ही शिकायत करने में 5 साल से ज़्यादा की देरी को भी अहम माना गया।

सिंह पर एक और आरोप यह था कि सितंबर 2019 में कजाकिस्तान में टोक्यो ओलंपिक क्वालिफिकेशन के दौरान, उन्होंने जबरदस्ती एक पीड़ित को पकड़ा था; इस घटना को एक अन्य पीड़ित ने भी देखा था, जिसने उसी इवेंट में हिस्सा लिया था।

इस पर कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद तस्वीरों से पता चलता है कि वे पल जश्न मनाने वाले थे और टूर्नामेंट या मैच जीतने या हारने के बाद उत्साह और जश्न के माहौल में गले मिलना या बधाई देना स्वाभाविक व्यवहार है। कोर्ट ने यह भी कहा कि उन तस्वीरों में कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि पीड़ित सिंह के साथ सहज नहीं थी। इसी तरह के आधार पर, 2018 में जकार्ता में एशियाई खेलों में एक पीड़ित के प्रदर्शन के बाद सिंह द्वारा जबरदस्ती गले लगाने के आरोप को भी खारिज किया गया।

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि पीड़ितों में से एक ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट और मीडिया इंटरव्यू में केवल सामान्य आरोप लगाए और आरोपी का नाम नहीं लिया था।

एक बात बार-बार सामने आई कि कई गवाहों ने, जिन्होंने बाद में घटनाओं को देखने या उनके बारे में जानने का दावा किया, ओवरसाइट कमेटी के सामने पहले दिए गए हलफनामों में उन तथ्यों का ज़िक्र नहीं किया। अन्य पहलवानों की शिकायतों में बताई गई तारीखों जैसे तथ्यों में भी विसंगतियां पाई गईं।

एक अन्य महिला ने आरोप लगाया कि 2018 में बिश्केक में एशियाई चैंपियनशिप के दौरान, एक खास तारीख को वार्म-अप करते समय उसका यौन उत्पीड़न किया गया। कोर्ट ने टूर्नामेंट के आधिकारिक शेड्यूल का हवाला दिया, जिससे पता चला कि उसकी कैटेगरी का मुकाबला असल में अगली तारीख के लिए तय था। कोर्ट ने इस विसंगति को महत्वपूर्ण माना, क्योंकि गवाह का कहना था कि कथित घटना के कारण वह मुकाबला हार गई। कोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को खारिज किया कि उसे विवरण याद नहीं थे क्योंकि उसने कई टूर्नामेंटों में भाग लिया था।

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि उसकी चुप्पी का कारण - यानी यह डर कि उसका करियर खराब हो जाएगा - उसके पहले के धारा 161 या धारा 164 के बयानों में दर्ज नहीं था, और उसने विरोध प्रदर्शन से कुछ समय पहले, 2023 में ही किसी अन्य गवाह को इस घटना के बारे में बताया। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इन परिस्थितियों से गंभीर संदेह पैदा होता है और आरोपी को संदेह का लाभ मिलना चाहिए।

धरने पर बैठने से पहले पीड़ितों में से किसी ने भी यौन उत्पीड़न का आरोप नहीं लगाया और न ही किसी ऐसी महिला पहलवान का नाम लिया गया, जिसने कथित यौन उत्पीड़न का सामना किया हो। कोर्ट ने कहा कि बाद में अप्रैल 2023 में पुलिस को दी गई "खास तौर पर तैयार की गई औपचारिक शिकायतों" में ये आरोप शामिल किए गए।

साथ ही पांच पीड़ितों में से दो अपनी बात से पलट गईं और कहा कि उन्हें दो अन्य महिला पहलवानों के कहने पर बयान देने के लिए मजबूर या उन पर दबाव डाला गया।

आखिरकार, कोर्ट ने सबूतों की जांच की, जिनमें पीड़ितों के बयान, गवाहों की गवाही, आस-पास की परिस्थितियां, घटना के बाद का व्यवहार, बयानों में आए बदलाव और विरोधाभास शामिल थे। कोर्ट ने पाया कि गवाहों के बयान अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन नहीं करते थे।

इस तरह कोर्ट ने माना कि इन परिस्थितियों से ऐसा उचित संदेह पैदा होता है, जो अभियोजन पक्ष के दावे को गलत साबित करने के लिए काफी है।

दिल्ली पुलिस ने उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 की धारा 354 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाना), 354A (यौन उत्पीड़न), 354D (पीछा करना) और 506(1) (आपराधिक धमकी) के तहत चार्जशीट दाखिल की थी। तोमर के खिलाफ IPC की धारा 109 (उकसाना) भी लगाई गई।

हालांकि, एक नाबालिग पहलवान द्वारा सिंह के खिलाफ दर्ज POCSO मामले में कैंसिलेशन रिपोर्ट (मामला बंद करने की रिपोर्ट) दाखिल की गई।

महिला पहलवानों ने सिंह पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यौन उत्पीड़न की ये कथित घटनाएं 2016 और 2019 के बीच WFI ऑफिस, सिंह के सरकारी आवास और विदेश में हुईं।

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags:    

Similar News