'याचिका वापस लें या हम जुर्माना लगाकर खारिज करेंगे': कोर्ट परिसरों में राष्ट्रीय ध्वज/न्याय की मूर्ति की स्थापना की मांग वाली याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा
Delhi High Court
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें राष्ट्रीय राजधानी स्थित न्यायालय परिसरों में भारतीय झंडे और न्याय की प्रतिमा स्थापित करने की मांग की गई थी। चीफ जस्टिस डीएन पटेल ने याचिकाकर्ता को कुछ देर सुनने के बाद कहा, 'क्या आप याचिका को वापस लेंगे या हमें जुर्माना लगाना चाहिए?'
सुनवाई की शुरुआत में, जस्टिस ज्योति सिंह की पीठ ने याचिका में की गई प्रार्थनाओं की अस्पष्टता पर नाराजगी व्यक्त की।
याचिका में कहा गया है, "न्यायालय साहस, आत्मविश्वास और अपराधों में कमी के पहलू में अनुरोध पर विचार कर सकता है क्योंकि न्याय की मूर्ति भ्रष्टाचार, पक्षपात, लालच या पूर्वाग्रह के बिना कानून के निष्पक्ष और समान प्रशासन का प्रतीक है। अपराध के सिद्धांत के अनुसार भावना, देशभक्ति और राष्ट्रवाद का उदय एक व्यक्ति के मन में अदालतों का उत्साहपूर्ण दृश्य और परिवेश को गर्व से देखने के बाद होगा।"
प्रतिवादियों के वकील ने यह भी कहा कि वे प्रार्थना के अर्थ को समझने के असमर्थ हैं।
यह जनहित याचिका राजकिशोर प्रसाद कुशवाहा ने एडवोकेट श्रीकांत प्रसाद के जरिए दायर की थी। याचिका में मांगी गई राहत की व्याख्या करने के लिए कहने पर, उन्होंने प्रस्तुत किया, "भारतीय झंडे और न्याय की मूर्ति को अदालतों के अंदर और अदालत परिसर के प्रवेश द्वार पर रखने से सकारात्मक उत्साही बल फैलेगा, जो अपराधियों को आपराधिक गतिविधियों को करने से रोकेगा। मेरी प्रार्थना न्यायपालिका के पहलू पर नहीं है। हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। मेरी प्रार्थना अपराधियों आदि के संबंध में है।"
कोर्ट ने पूछा, "क्या यह (प्रस्तुतियां) समाप्त हो गई है?"
वकील ने जोर देकर कहा , "आपराधिक गतिविधि इस पर आधारित है कि कोई व्यक्ति अपने आस-पास क्या देखता है, वह उसके प्रति आकर्षित हो जाता है और यदि वह अदालत परिसर में राष्ट्रीय ध्वज, न्याय की मूर्ति देखेगा तो यह उसमें एक अच्छा व्यक्ति बनने की धारणा पैदा करेगा।"
उन्होंने कहा, "न्यायालय न्याय के मंदिर हैं और इसलिए, भगवान की एक मूर्ति होनी चाहिए- न्याय की मूर्ति। "
कुछ देर तक मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने कहा , 'अब आप जुर्माने की हद में आ गए हैं ।
याचिका को "बिना शर्त" वापस लेने के रूप में खारिज कर दिया गया।
केस टाइटिल: राजकिशोर प्रसाद कुशवाहा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया