'नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने में राज्य की विफलता अनुच्छेद 21 का उल्लंघन': पटना हाईकोर्ट ने राज्य मानवाधिकार आयोग को COVID-19 अस्पतालों की जांच का निर्देश दिया

Update: 2021-04-21 09:43 GMT

पटना हाईकोर्ट ने बिहार राज्य में COVID-19 के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए राज्य सरकार की ओर से कोई भी व्यापक कार्य योजना नहीं बनाए जाने पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए बिहार मानवाधिकार आयोग को हस्तक्षेप करने के लिए कहा है।

जस्टिस सीएस सिंह और जस्टिस मोहित कुमार शाह की डिवीजन बेंच ने कहा कि COVID-19 महामारी के बीच में पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को प्रदान किए गए जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।

बेंच ने कहा कि,

"भारत के संविधान के अनुच्छेद 12 के अर्थ में राज्य की ओर से अपने नागरिक को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने में विफलता विशेष रूप से COVID-19 महामारी के दौरान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन होगा।"

बेंच ने चिकित्सा उपयोग के लिए ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी के खिलाफ भी कड़ा रुख अपनाया है।

बेंच ने कहा कि,

"ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी के कारण विभिन्न सरकारी और निजी अस्पतालों में होने वाली मौतों के बारे में गंभीर मुद्दे उठाए गए हैं। यदि इस तरह के आरोप सही हैं यह अदालत इन पहलुओं को नजरअंदाज नहीं कर सकती है क्योंकि यह सीधे नागरिकों के मौलिक अधिकार से संबंधित है। यदि न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी के कारण COVID-19 रोगियों की मौत हो रही है या मौत हुई है तो न्यायालय न्यायिक समीक्षा की अपनी शक्ति का प्रयोग करेगा और निश्चित रूप से इस संबंध में उचित आदेश पारित करेगा।"

राज्य मानवाधिकार आयोग को कोविड समर्पित अस्पतालों (DCHs) और कोविड समर्पित स्वास्थ्य केंद्रों (DCHCs) के साथ-साथ कोविड केयर सेंटर (CCCs) का बिना बताए दौरा करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि पता लगाया जा सके कि वहां सैनिटाइजेशन और स्वच्छता की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं।

बेंच ने यह निर्देश राज्य में स्वास्थ्य अवसंरचना की उपलब्धता और कथित जमीनी हकीकत में राज्य द्वारा दिखाए गए आंकड़ों में विसंगति पाए जाने के बाद दिया गया है।

पीठ ने कहा कि,

"यदि प्रस्तुत आंकड़ों को सही माना जाए तो बिहार राज्य में पटाना को छोडकर उपलब्ध बेड की संख्या रोगियों की संख्या से अधिक है जिन्हें कोविड समर्पित अस्पतालों (DCHs) और कोविड समर्पित स्वास्थ्य केंद्रों (DCHCs) के साथ-साथ कोविड केयर सेंटर में (CCCs) में रखा गया है। हालांकि प्रथम दृष्टया हम उक्त बातों से सहमत नहीं हैं।"

बेंच ने सुनवाई के दौरान विभिन्न मुद्दों मुद्दों को उठाया है।

ऑक्सीजन की कमी

बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि अस्पतालों में ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं होने के कारण COVID-19 संक्रमित पटना उच्च न्यायालय के एक अधिकारी की मौत हो गई।

बेंच ने इस मामले में अदालत के हस्तक्षेप की आवश्यकता है या नहीं यह जांचने के लिए पटना उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वह इस अदालत को एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करें जिसमें उन परिस्थितियों के बारे में विस्तार से बताया गया जाए जिसमें उक्त हाईकोर्ट की मौत हो गई।

राज्य में ड्रग कंट्रोलर की नियुक्ति

खंडपीठ को सूचित किया गया कि राज्य के ड्रग कंट्रोलर का पद नियमित आधार पर नहीं भरा गया है और कई सालों से व्यक्ति उक्त पद को एड हॉक के आधार पर अपने पास रखा है।

इस पृष्ठभूमि में राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वह अदालत को सूचित करें कि राज्य के रेगुलर ड्रग कंट्रोलर है पास ड्रग्स है या नहीं।

COVID-19 के उपचार में रेमडेसिविर इंजेक्शन का कोई कारगर प्रभाव नहीं है।

बेंच को पटना एम्स प्रमुख ने सूचित किया कि COVID-19 रोगियों के उपचार के लिए रेमडेसिविर इंजेक्शन की प्रभावशीलता के बारे में आम लोगों के मन में एक गलत धारणा है।

पटना एम्स के निदेशक डॉ. पीके सिंह ने अदालत को बताया कि, "इस बात का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि उक्त रेमडेसिविर इंजेक्शन COVID-19 संक्रमित रोगियों के इलाज के लिए मददगार है।"

आगे कहा कि यह आम जनता के मन में व्याप्त एक गलत धारणा है। इस गलत धारणा के चलते अचानक से रेमडेसिविर इंजेक्शन बाजार में आउट ऑफ स्टॉक हो गया। अनावश्यक रूप से मांग और पैनिक होकर लोगों द्वारा अधिक खरीदारी के कारण इसकी कमी हुई।

हालांकि बेंच इस मामले में कोई टिप्पणी करने से बचा और राज्य को आवश्यक कार्रवाई करने को कहा है।

कोर्ट ने कहा कि,

"हम इस स्तर पर खुद को इस संबंध में कोई भी टिप्पणी करने से रोकते हैं। हालांकि हम उस स्थिति का निरीक्षण कर रहे हैं जिसमें राज्य सरकार विशेषज्ञों के परामर्श से जरूरतमंदों को हर संभव मदद कर रही है।"

चिकित्सा अपशिष्ट निपटान

बेंच ने राज्य स्वास्थ्य सोसाइटी के कार्यकारी निदेशक से कहा कि वह निजी प्रयोगशालाओं में COVID-19 टेस्ट किट, टीकाकरण के लिए इस्तेमाल की जाने वाली सुई, पीपीई किट और फेस मास्क के निपटारने करने की प्रक्रिया के बारे में अदालत को सूचित करें।

केस का शीर्षक: शिवानी कौशिक बनाम भारत संघ और अन्य।

आदेश की कॉपी यहां पढ़ें:



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