महिला के खिलाफ यौन अपराधः अभियुक्त के साथ किसी भी प्रकार का समझौता/विवाह जमानत की शर्त का हिस्सा नहीं होना चाहिए: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

Update: 2021-05-30 06:47 GMT

एक महत्वपूर्ण अवलोकन में, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि एक महिला के खिलाफ यौन अपराधों में जमानत देते समय, जमानत की शर्तें, जो पीड़ित को "निष्पक्ष न्याय" की शर्तों के खिलाफ हैं, जैसे कि आरोपी के साथ समझौता या शादी, को किसी भी रूप में लागू नहीं किया जाना चाहिए।

जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की खंडपीठ ने यह भी कहा कि अदालत, ऐसे मामलों में जमानत देते समय, सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपर्णा भट्ट और अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य, एलएल 2021 एससी 168 में पारित निर्देशों को ध्यान में रखेगी।

अपर्णा भट्ट मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था, "ऐसी (जमानत) शर्ते लगाना जो परोक्ष रूप से अभियुक्त द्वारा किए गए नुकसान को कम करने या माफ करने की ओर प्रवृत्त हों और जो पीड़ित को संभावित रूप से दूसरा आघात देने जैसा प्रभाव रखती हों, जैसे कि नॉन-कंपाउंडेबल अपराधों में मध्यस्थता प्रक्रियाओं को अनिवार्य करना, जमानत शर्तों के हिस्से के रूप में अनिवार्य करना, सामुदायिक सेवा (यौन अपराध के अपराधी के प्रति तथाकथित सुधारात्मक दृष्टिकोण के साथ बोलने के तरीके में) या एक बार या बार-बार माफी मांगने की आवश्यकता, या किसी भी तरह से पीड़िता के संपर्क में रहना या होना, विशेष रूप से निषिद्ध होता है।"

मामला

आवेदक, इमरान ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, फिरोजाबाद द्वारा आईपीसी की धारा 452, 377, और 506 के तहत अपराधों के संबंध में उसकी जमानत याचिका को खारिज करने के बाद एक जमानत आवेदन दायर किया था।

उसके वकील ने तर्क दिया कि आवेदक एक ड्राइवर और विवाहित व्यक्ति है और कथित तौर पर, पीड़ित जो एक ट्रांसजेंडर है, उसकी टैक्सी का इस्तेमाल आने जाने के लिए करती थी और आवेदक से पैसे उगाहने के लिए वर्तमान मामले में झूठा फंसाया गया था।

पहले मुखबिर के वकील और एजीए ने पीड़िता के बयान पर भरोसा करते हुए कहा कि पहले मुखबिर को प्रताड़ित किया गया था और जबरदस्ती यौन संबंध बनाए गए थे, हालांकि, उन्होंने इस बात पर विवाद नहीं किया कि शुरू में दो साल तक आवेदक और पीड़ित के बीच सहमति से संबंध थे।

कोर्ट की टिप्पणियां

शुरुआत में, अदालत ने कहा कि जमानत के आवेदन पर विचार करते समय अदालत को मामले के गुण-दोषों जैसे अभियोजन पक्ष के गवाहों की विश्वसनीयता और भरोसे के सवाल पर गहराई से विचार किया जाना चाहिए, जिसे केवल परीक्षण के दौरान ही परखा जा सकता है।

अदालत ने आगे कहा कि उन कारणों को दर्ज करना चाहिए जिनकी सहायता से जमानत देने या खारिज करने के आदेश देते समय विवेकाधीन शक्ति के प्रयोग में सहूलियत हो। जमानत देने की शर्तें इतनी सख्त नहीं होनी चाहिए कि अनुपालन में असमर्थ हों, जिससे जमानत की मंजूरी भ्रामक हो।

जमानत देते समय कोर्ट ने कहा था, "न्यायालय को एक महिला के खिलाफ यौन अपराध से जुड़े मामलों में जमानत देते समय जमानत की ऐसी शर्तों को अनिवार्य नहीं करना चाहिए, जो कि पीड़ित को "निष्पक्ष न्याय" की शर्त के खिलाफ है, जैसे कि किसी भी तरह का समझौता या आरोपी के साथ शादी करना आदि। और इस संबंध में अपर्णा भट्ट और अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य, 2021 एससीसी ऑनलाइन एससी 230 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित निर्देशों को ध्यान में रखेगा।"

अपर्णा भट्ट मामला

मार्च 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें अदालत ने आरोपी को पीड़िता (जिनसे पड़ोसी पर शील भंग का आरोप लगाया) की कलाई पर राखा बांधने की जमानत की शर्त लगाई थी।

कोर्ट ने निम्नलिखित दिशानिर्देश जारी किए:

-जमानत की शर्तों में आरोपी और पीड़ित के बीच संपर्क की आवश्यकता, या अनुमति नहीं देनी चाहिए। ऐसी शर्तों को शिकायतकर्ता को आरोपी द्वारा किसी और उत्पीड़न से बचाने की कोशिश करनी चाहिए;

-जहां अदालत के लिए यह विश्वास करने की परिस्थितियां मौजूद हैं कि पीड़ित के उत्पीड़न का संभावित खतरा हो सकता है, या आशंका व्यक्त होने पर, पुलिस से रिपोर्ट मांगने के बाद, सुरक्षा की प्रकृति पर अलग से विचार किया जाएगा और उचित आदेश दिया जाएगा, साथ ही आरोपी को निर्देश दिया जाएगा कि पीड़ित के साथ कोई संपर्क ना करे।

-सभी मामलों में जहां जमानत दी जाती है, शिकायतकर्ता को तुरंत सूचित किया जाना चाहिए कि आरोपी को जमानत दे दी गई है और दो दिनों के भीतर जमानत आदेश की एक प्रति उसे सौंप दी जाए।

-जमानत की शर्तों और आदेशों में महिलाओं और समाज में उनके स्थान के बारे में रूढ़िवादी या पितृसत्तात्मक विचारों को प्रतिबिंबित करने से बचना चाहिए और सख्ती से सीआरपीसी की आवश्यकताओं का अनुपालन होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, जमानत के फैसले में अभियोजन पक्ष की पोशाक, व्यवहार, या पिछले "आचरण" या "नैतिकता" के बारे में चर्चा नहीं की जानी च‌ाहिए। अदालतों को लैंगिक अपराधों से जुड़े मामलों का फैसला करते समय, अभियोक्ता और आरोपी के बीच शादी करने के लिए समझौता करने, आरोपी और पीड़ित के बीच मध्यस्थता का सुझाव देने जैसे किसी भी विचार (या किसी भी कदम को प्रोत्साहित करना) का सुझाव नहीं देना चाहिए, क्योंकि यह उनकी शक्तियों और अधिकार क्षेत्र से परे है;

-न्यायाधीशों को हर समय संवेदनशीलता प्रदर्शित करनी चाहिए, जिन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कार्यवाही के दौरान, या बहस के दौरान कही गई किसी भी बात से अभियोक्ता को कोई आघात न पहुंचे, और

-न्यायाधीशों को ऐसे शब्दों का उपयोग नहीं करना चाहिए, जिससे अदालत की निष्पक्षता पर से प‌ीड़िता का विश्वास कमजोर हो या हिल जाए।

केस टाइट‌िल- इमरान बनाम यूपी राज्य

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