जस्टिस डॉ. नीला गोखले ने शुक्रवार को कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) धारा 498ए का दुरुपयोग नहीं किया गया, बल्कि इसे सभी ने गलत समझा है।

जज ने कहा कि धारा 498ए का दुरुपयोग बहुत कम महिलाओं द्वारा किया जा सकता है, लेकिन इसका उपयोग "पूरे ड्राइंग बोर्ड को एक रंग में रंगने" के लिए नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा,

"मैं कह सकती हूं कि धारा 498ए का दुरुपयोग नहीं किया गया, लेकिन इसे सभी ने गलत समझा है। लेकिन अब समय आ गया कि हम बार और बेंच के रूप में इस अवसर पर आगे आएं और अपने मुवक्किलों को उचित सलाह दें।"

बॉम्बे हाईकोर्ट के जज ने कहा कि "डोली में बैठ कर आई है तो अर्थी पर ही जाएगी" वाली मानसिकता महिलाओं के लिए अपने पति और ससुराल वालों द्वारा की गई घरेलू हिंसा की रिपोर्ट करने में सबसे बड़ी बाधा है। जज ने 2003 की एक सरकारी रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें खुलासा हुआ कि 30 प्रतिशत से अधिक विवाहित महिलाओं को अपने पति और उनके करीबी रिश्तेदारों के हाथों शारीरिक, यौन और भावनात्मक यातना का सामना करना पड़ता है।

जस्टिस गोखले ने जोर दिया,

"ये केवल रिपोर्ट किए गए मामले हैं। ऐसे कई हज़ार मामले हो सकते हैं, जिनकी रिपोर्ट ही नहीं की जाती। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह मानसिकता है कि 'डोली में बैठ कर आई, तो अब अर्थी पर ही जाएगी।' महिलाओं के लिए हिंसा की रिपोर्ट करने में यह सबसे बड़ी बाधा है।"

जज ने कहा कि ऐसा "सामाजिक अपेक्षाओं" या जिस तरह से समाज "वातानुकूलित" है, उसके कारण है। उन्होंने कहा कि जिस तरह परिवार में शांति बनाए रखना और उसे अक्षुण्ण रखना परिवार के सभी सदस्यों की जिम्मेदारी है, लेकिन "पितृसत्तात्मक" मानसिकता के कारण इसे घर में अकेली महिलाओं की जिम्मेदारी माना जाता है।

जज इंटरएक्टिव लॉयर्स एसोसिएशन फॉर विमेन (ILAW) द्वारा "धारा 498A का उपयोग और दुरुपयोग" विषय पर आयोजित "इंटरैक्टिव व्याख्यान" में बोल रहे थे।

इस मुद्दे पर बोलते हुए जज ने स्पष्ट किया कि कोई भी महिला कभी भी झूठी शिकायत दर्ज नहीं कराएगी या दहेज उत्पीड़न के खिलाफ महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए इस प्रावधान का दुरुपयोग नहीं करेगी।

जस्टिस गोखले ने समझाया,

"कभी-कभी ऐसा होता है कि जब कोई महिला भरण-पोषण मांगती है तो पति और ससुराल वाले उसे राशि देने से बचने के लिए तरह-तरह के बहाने बनाते हैं। इसलिए भरण-पोषण पाने के लिए वह धारा 498A का मामला दर्ज कराती है। पति की बहन को इसमें शामिल करती है, जो शायद किसी दूसरी जगह रह रही हो। इसके बाद ससुराल वाले भुगतान करते हैं, क्योंकि वे नहीं चाहते कि उनकी बेटी मुकदमेबाजी में परेशान हो।"

इसलिए जज ने कहा कि ससुराल वालों को इस तरह से फंसाना केवल अंतर्निहित आवश्यकता के कारण है।

जज ने कहा,

"महिला होने के नाते मैं नहीं सोचती कि कोई भी महिला मुकदमेबाजी करके अपने पति और उसके परिवार को परेशान करना चाहेगी। उसे केवल रखरखाव आदि जैसी बुनियादी चीजों की आवश्यकता होगी। मुझे नहीं लगता कि कोई भी महिला तब तक झूठे मामले दर्ज कराएगी, जब तक कि कोई अंतर्निहित आवश्यकता न हो।"

लेकिन अतिशयोक्ति के ऐसे मामलों के बीच जज ने इस बात पर जोर दिया कि "वास्तविक पीड़ित" पीड़ित हैं, क्योंकि उनके हित खतरे में पड़ जाते हैं।

जज ने कहा,

"बेंच पर बैठते समय हम एक दिन में लगभग 10 ऐसे मामले देखते हैं, जिनमें धारा 498ए के तत्व नहीं बनते और अतिशयोक्ति होती है। हो सकता है कि 11वां मामला वास्तविक हो... लेकिन अतिशयोक्ति के पहले 10 मामलों के कारण हम 11वें मामले को कैसे देखते हैं? हो सकता है कि 11वां मामला बोर्ड के 10 मामलों की बजाय पहला हो। इस तरह वास्तविक मामलों के हित खतरे में पड़ जाते हैं। यह हमारा सबसे बड़ा डर है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।"

जज ने व्याख्यान में उपस्थित वकीलों से यह भी कहा कि वे पीड़ित महिलाओं को "व्यावहारिक" सलाह दें, जो उनके पास आती हैं और उन्हें लंबी मुकदमेबाजी में "उलझाएं" नहीं।

जज ने कहा,

"मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि आप सभी को उन महिलाओं को व्यावहारिक राहत देने के लिए सलाह देने की जरूरत है, जो आपके पास आती हैं। आपको उनके लिए यह अंतर करना होगा कि क्या आम कलह है और क्या धारा 498ए के तहत क्रूरता है। किसी महिला को उसकी गलती के लिए डांटना क्रूरता नहीं है, लेकिन उसे लगातार ताना मारना और तुच्छ आधार पर उसका अपमान करना क्रूरता है।"

कार्यक्रम का समापन जज द्वारा हाईकोर्ट की नवनियुक्त महिला सीनियर - सीमा सरनाइक, नीता कार्निक और मंजरी शाह को सम्मानित करने के साथ हुआ। कार्यक्रम का आयोजन एडवोकेट अनीता कैस्टेलिनो के नेतृत्व में किया गया।

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