एक राज्य के आरक्षण लाभ का दूसरे राज्य में दावा नहीं किया जा सकता, भले ही प्रवास विवाह के कारण हुआ हो: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2022-11-16 09:11 GMT

Himachal Pradesh High Court

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 'अनुसूचित जनजाति' के व्यक्ति होने के आधार पर आरक्षण का दावा करने वाले एक उम्मीदवार की तरफ से दायर एक मामले में कहा कि एक राज्य के आरक्षण लाभ का दूसरे राज्य में दावा नहीं किया जा सकता, भले ही प्रवास विवाह के कारण हुआ हो।

मामला एक याचिकाकर्ता महिला से जुड़ा है, जो जन्म से हरियाणा की गुर्जर जाति की थी। याचिकाकर्ता ने नैन सिंह से शादी की थी, जो उसी जाति के थे। याचिकाकर्ता की जाति, शादी से पहले और बाद में, एक ही रही, फर्क सिर्फ इतना है कि गुर्जर समुदाय को हिमाचल प्रदेश में 'अनुसूचित जनजाति' के रूप में मान्यता प्राप्त है, जबकि हरियाणा में इसे ओबीसी समुदाय के रूप में मान्यता प्राप्त है।

याचिकाकर्ता ने बाद में भाषा शिक्षक (एसटी) के पद के लिए आवेदन किया। हालांकि, प्रतिवादी-अधिकारियों ने इस आधार पर उसकी भर्ती से इनकार कर दिया कि याचिकाकर्ता 'अनुसूचित जनजाति' की उम्मीदवार नहीं है और इसलिए उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता है।

कोर्ट के समक्ष सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि क्या एक राज्य से दूसरे राज्य में प्रवास पर, क्या कोई व्यक्ति, जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित हो सकता है, प्रवासी राज्य में ऐसी स्थिति के लाभ का दावा कर सकता है।

जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस वीरेंद्र सिंह की खंडपीठ ने कहा कि प्रवास किसी व्यक्ति द्वारा दूसरे राज्य में लाभ का दावा करने के लिए पर्याप्त कारण नहीं है, भले ही ऐसा प्रवास विवाह के कारण हुआ हो।

उच्च न्यायालय ने कहा कि एक राज्य में किसी विशेष जाति या जनजाति को अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग के रूप में घोषित करने के लिए वस्तुनिष्ठ मानदंड ऐसे राज्य में प्रचलित पिछड़ेपन, सामाजिक असमानता और आर्थिक नुकसान का विशिष्ट स्तर है।

यह डॉ. जयश्री लक्ष्मण राव पाटिल बनाम मुख्यमंत्री और अन्य और भादर राम (मृतक) के मामले में कानूनी प्रतिनिधियों बनाम जस्सा राम और अन्य के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट का लगातार दृष्टिकोण रहा है।

कोर्ट ने कहा,

"हालांकि, एक राज्य में अनुसूचित जाति/जनजाति/ओबीसी के रूप में अधिसूचित एक जाति को दूसरे राज्य में अधिसूचित अनुसूचित जाति/जनजाति/ओबीसी की सूची में भी जगह मिल सकती है, लेकिन इसे विवाह के माध्यम से भी प्रवासन के बाद एक व्यक्ति द्वारा अन्य राज्य में लाभ का दावा करने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया है।"

केस टाइटल: प्रियंका बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य एंड अन्य

साइटेशन: सिविल रिट याचिका (मूल आवेदन) संख्या 2309 2020

कोरम : जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस वीरेंद्र सिंह

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