राम मंदिर चंदा घोटाला: आरोपियों की पैरवी पर रोक का अयोध्या बार एसोसिएशन का प्रस्ताव अवैध? सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले उठाते हैं सवाल

Update: 2026-06-30 07:13 GMT

अयोध्या के राम मंदिर के लिए प्राप्त दान राशि के कथित गबन मामले में उत्तर प्रदेश की फैजाबाद/अयोध्या बार एसोसिएशन ने एक प्रस्ताव पारित कर अपने सदस्यों को आरोपियों की ओर से अदालत में पेश होने से रोक दिया है। एसोसिएशन ने यह भी शर्त रखी है कि यदि कोई अधिवक्ता किसी आरोपी की पैरवी करना चाहता है तो उसे पहले एसोसिएशन से अनुमति लेनी होगी और प्रत्येक आरोपी के लिए ₹5 लाख एसोसिएशन के खाते में जमा कराने होंगे।

हालांकि, यह प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के कई फैसलों के विपरीत माना जा रहा है। न्यायालय पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि किसी भी बार एसोसिएशन को किसी आरोपी की ओर से वकीलों के पेश होने पर रोक लगाने का अधिकार नहीं है।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों के अनुसार, किसी अधिवक्ता का कर्तव्य है कि वह, यदि कोई वैध कारण न हो, तो अपने पास आने वाले मुकदमे को स्वीकार करे। केवल आरोपों की प्रकृति या आरोपी के प्रति व्यक्तिगत राय के आधार पर पैरवी से इनकार नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने A.S. Mohammed Rafi v. State of Tamil Nadu (2010) में कहा था कि किसी विशेष आरोपी की पैरवी न करने संबंधी बार एसोसिएशन के प्रस्ताव "शून्य (Null and Void)" हैं और यह संविधान, कानून तथा पेशेवर नैतिकता के विरुद्ध हैं। अदालत ने ऐसे प्रस्तावों को "विधिक समुदाय के लिए शर्मनाक" तक बताया था।

इसके बाद Subedar v. State of Uttar Pradesh (2021) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी को वकील के माध्यम से अपना बचाव करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त मौलिक अधिकार का हिस्सा है। यदि निजी वकील उपलब्ध न हो तो अदालत को अमिकस क्यूरी नियुक्त करना चाहिए, लेकिन आरोपी का पक्ष बिना प्रतिनिधित्व के नहीं छोड़ा जा सकता।

पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस अभय ओका ने भी कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए कहा था कि किसी आरोपी को कानूनी सहायता से वंचित करना निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के खिलाफ है और ऐसे प्रस्ताव पारित करने वाले बार एसोसिएशनों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।

बाद में Rupashree HR v. State of Karnataka मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मैसूर बार एसोसिएशन के इसी तरह के प्रस्ताव को रद्द करते हुए कहा कि किसी आरोपी को अपनी पसंद के वकील से बचाव कराने का अधिकार मौलिक अधिकार है और बार एसोसिएशन इस पर रोक नहीं लगा सकती।

संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता तथा अनुच्छेद 39A समान न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता की गारंटी देता है। इसी कारण भारतीय न्याय व्यवस्था में गंभीर से गंभीर अपराधों के आरोपियों—चाहे वे अजमल कसाब, निर्भया मामले के दोषी या नाथूराम गोडसे ही क्यों न रहे हों—को भी कानूनी प्रतिनिधित्व उपलब्ध कराया गया।

वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने भी अयोध्या बार एसोसिएशन के प्रस्ताव की आलोचना करते हुए कहा कि यह आरोपी के संवैधानिक अधिकार और बार काउंसिल के पेशेवर आचरण नियमों का उल्लंघन है।

राम मंदिर दान गबन मामले में अब तक 8 लोगों के खिलाफ चोरी, धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश सहित विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि आरोपों की गंभीरता चाहे जितनी भी हो, प्रत्येक आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई और अपनी पसंद के अधिवक्ता से कानूनी प्रतिनिधित्व का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।

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