'मुकदमेबाज़ सुनवाई टलवाते हैं, फिर सोशल मीडिया पर कोर्ट की देरी की आलोचना करते हैं': इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-08-11 05:05 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को उन मुकदमेबाज़ों की आलोचना की, जो कोर्ट की कार्यवाही में सुनवाई टलवाने की मांग करते हैं और बाद में देरी के लिए सोशल मीडिया पर कोर्ट की आलोचना करते हैं।

जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की बेंच ने कहा,

"कम से कम इस राज्य की अदालतों में हर दूसरे मामले की यही कहानी है, जहाँ मुकदमेबाज़ बिना किसी झिझक के सुनवाई टलवाते हैं और तुरंत बाद सोशल मीडिया साइटों पर बैठकर देरी के लिए कोर्ट की आलोचना करते हैं। न्यायिक प्रक्रिया में ज़्यादातर देरी उन मुकदमेबाज़ों की वजह से होती है, जिन्हें इससे फ़ायदा होता है।"

कोर्ट एक 'फ़र्स्ट अपील' (पहली अपील) पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें प्रतिवादी (Respondent) व्यक्तिगत रूप से सूचना मिलने और उसकी ओर से दो वकीलों के पेश होने के बावजूद कोर्ट में हाज़िर नहीं हुआ।

जब मामले की सुनवाई के लिए पुकार हुई तो प्रतिवादी की ओर से कोई पेश नहीं हुआ, जिस पर बेंच ने यह टिप्पणी की:

"हमारी राय में प्रतिवादी की ओर से पेश होने का दिखावा कोर्ट की कार्यवाही से बचने की एक चाल है।"

इसके बाद कोर्ट ने मुकदमेबाज़ों द्वारा सुनवाई टलवाने और बाद में देरी के लिए कोर्ट को दोषी ठहराने की इस आदत की निंदा की।

इसे एक पुरानी "आदत या गलत चलन" बताते हुए कोर्ट ने कहा कि जो मुकदमेबाज़ ऐसा व्यवहार करते हैं और फिर देरी की शिकायत करते हैं, वे ऐसा आचरण कर रहे हैं, जिससे कोर्ट की अवमानना ​​(Contempt) की कार्यवाही शुरू हो सकती है।

बेंच ने यह टिप्पणी की:

"यह एक पुरानी आदत या गलत चलन रहा है, कम-से-कम इस राज्य की अदालतों में; लेकिन इस तरह के गलत चलन में शामिल होने के बाद कोर्ट में देरी का रोना रोना एक ऐसा मामला है जिस पर सही मायने में हमारी अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू की जा सकती है।"

इस टिप्पणी को देखते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रतिवादी को व्यक्तिगत रूप से सूचना दी जाए और वह 14 अगस्त, 2026 को दोपहर 2 बजे कोर्ट के सामने पेश हो।

अपील को उसी तारीख पर सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया जिस तारीख पर सूचना तामील (Service) की रिपोर्ट आएगी।

बेंच ने रजिस्ट्री को उन दोनों वकीलों को लिखित सूचना भेजने का भी निर्देश दिया, जिन्होंने 24 जुलाई, 2026 को अपना वकालतनामा दाखिल किया था। उनसे यह बताने को कहा गया कि उनमें से एक कोर्ट के सामने पेश होने में क्यों नाकाम रहा।

पिछले साल भी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक देरी में मुकदमेबाज़ों की भूमिका को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। इसे एक ऐसी 'समस्या' बताते हुए जिस पर 'न तो कोई बात करता है और न ही इसकी निंदा करता है', जस्टिस मुनीर ने कहा था कि इस आदत को 'सख्ती से रोकना' ज़रूरी है।

सिंगल जज ने इसे 'हैरान करने वाला' बताया कि अदालतों में देरी को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध के बावजूद, जब मुक़दमेबाज़ अदालत में आते हैं तो वे अपने फ़ायदे के हिसाब से सुनवाई टलवाने (एडजर्नमेंट) की मांग करते हैं और उसका फ़ायदा उठाते हैं।

अदालत ने टिप्पणी की थी,

"यह हैरानी की बात है कि अदालतों में देरी के ख़िलाफ़ इतने बड़े पैमाने पर विरोध के बावजूद, देश के नागरिक - चाहे वे किसी भी पद पर हों - जब मुक़दमेबाज़ के तौर पर अदालत में आते हैं, तो वे समय मांगना और अपने फ़ायदे के हिसाब से सुनवाई टलवाना पसंद करते हैं। अदालत में देरी में मुक़दमेबाज़ जनता का जो योगदान होता है - जो असल में एक समस्या है - उस पर न तो कोई बात करता है और न ही उसकी निंदा करता है। किसी भी हाल में, इस आदत को सख्ती से रोकना होगा।"

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