सावरकर ने ब्रिटिश हुकूमत को 10 दया याचिकाएँ दी थीं, भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों ने समझौता नहीं किया: पुणे कोर्ट में भतीजे का बयान

Update: 2026-06-16 08:04 GMT

पुणे की विशेष सांसद-विधायक अदालत में सोमवार को वीर सावरकर से जुड़े आपराधिक मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण बयान सामने आया।

विनायक दामोदर सावरकर के पड़पोते (ग्रैंडनेफ्यू) सत्यकी सावरकर ने अदालत में स्वीकार किया कि सावरकर ने ब्रिटिश सरकार के समक्ष अपनी सजा में राहत के लिए 10 दया याचिकाएँ दाखिल की थीं।

उन्होंने यह भी माना कि भगत सिंह, राजगुरु, अशफाकउल्ला खान और बटुकेश्वर दत्त जैसे कई क्रांतिकारियों ने ऐसी याचिकाएँ दाखिल नहीं कीं और अपने सिद्धांतों से अंत तक समझौता नहीं किया।

यह बयान स्पेशल जज अमोल शिंदे की अदालत में दर्ज हुआ, जहां कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि मामले की सुनवाई चल रही है।

यह मामला राहुल गांधी के लंदन में दिए गए एक भाषण से जुड़ा है जिसमें उन्होंने सावरकर को लेकर कुछ टिप्पणियाँ की थीं।

राहुल गांधी की ओर से वकील मिलिंद पवार द्वारा की जा रही जिरह के दौरान सत्यकी सावरकर ने कहा कि यह सच है कि सावरकर ने 10 बार दया याचिकाएँ दाखिल की थीं।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि सावरकर को वीर कहकर संबोधित किया जाता था, यहां तक कि उस समय भी जब वे दया याचिकाएँ दाखिल कर रहे थे।

जिरह के दौरान सत्यकी ने माना कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ब्रिटिश सरकार से युद्धबंदी जैसा दर्जा देने की मांग की थी लेकिन उन्होंने किसी प्रकार की रियायत या दया की मांग नहीं की।

उन्होंने स्वीकार किया कि दोनों क्रांतिकारी अपने विचारों और सिद्धांतों पर अंत तक अडिग रहे।

हालांकि सत्यकी सावरकर ने यह भी कहा कि दया याचिका दाखिल करना उस समय ब्रिटिश शासन के तहत एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया थी और केवल सावरकर ही नहीं, बल्कि अन्य कैदी भी इस प्रक्रिया का उपयोग करते थे।

उनके अनुसार याचिका दाखिल करना न तो असाधारण था और न ही अवैध।

सत्यकी ने अदालत को बताया कि सावरकर की सभी दया याचिकाएँ सरकारी अभिलेखों में उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि याचिकाओं की भाषा को ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

उनके अनुसार सावरकर ने इन याचिकाओं में अपनी सजा कम करने का अनुरोध किया लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उनकी सभी याचिकाएँ खारिज की थीं।

उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिटिश प्रशासन को आशंका थी कि यदि सावरकर को रिहा किया गया तो वह दोबारा क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं, जिससे ब्रिटिश शासन को खतरा पैदा होगा।

सुनवाई के दौरान सत्यकी सावरकर ने यह भी स्वीकार किया कि किसी भी कैदी पर दया याचिका दाखिल करने की कोई बाध्यता नहीं थी और यह पूरी तरह उस कैदी की व्यक्तिगत इच्छा पर निर्भर करता था कि वह ऐसी याचिका दायर करे या नहीं।

गौरतलब है कि सत्यकी सावरकर ने राहुल गांधी के खिलाफ यह मानहानि मामला दायर किया।

शिकायत में आरोप लगाया गया कि राहुल गांधी ने मार्च 2023 में ब्रिटेन में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सावरकर के बारे में कथित रूप से झूठे और मानहानिकारक बयान दिए, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।

मामले में सत्यकी सावरकर की जिरह अब 1 जुलाई को आगे जारी रहेगी।

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