अभियोजन पक्ष को साबित करना होगा कि भूस्वामी प्रतिबंधित अफीम के पौधों को खेती कर रहा था, एनडीपीएस मामले में आरोपी को बरी करने के फैसले को बाॅम्बे हाईकोर्ट ने सही ठहराया

Update: 2020-04-04 03:00 GMT

बॉम्बे हाई कोर्ट ने कुछ सप्ताह पहले एक 64 वर्षीय व्यक्ति को बरी कर दिया था। जिस पर आरोप था कि वह सतारा जिले के वई तालुका के तहत आने वाले गाँव बावधन के खेतों में अफीम-खसखस के पौधों की खेती करता था। 

न्यायमूर्ति एस.एस शिंदे और न्यायमूर्ति वी.जी बिष्ट की खंडपीठ ने कहा कि अफीम-खसखस के पौधे जिस क्षेत्र में पाए गए थे, वह आरोपी का था, परंतु इसका मतलब यह नहीं था कि वह क्षेत्र विशेष रूप से उसके ही नियंत्रण में था।

केस की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिवाजी रसाल (अभियोजन पक्ष का गवाह नंबर 3) घटना के समय राज्य उत्पाद शुल्क कार्यालय, वई में कार्यरत थे।

उसे सूचना मिली थी कि कुछ किसान गाँव बावधन में अपने खेतों में अफीम-पोस्ता या खसखस की खेती कर रहे हैं। रसाल ने अधीक्षक, राज्य उत्पाद शुल्क, सतारा को इस बारे में जानकारी दी और फिर 25 फरवरी, 1997 को उन्होंने पंच गवाहों और अन्य स्टाफ सदस्यों के साथ प्रतिवादी अभियुक्त के स्वामित्व वाले खेतों में छापा मारा।  

खेत में अफीम-पोस्ता के पौधे पाए गए थे। उन पौधों में से, दो पौधों को उखाड़ लिया गया और नमूने के तौर पर रख लिया गया। जिनको मौके पर विधिवत तरीके से सील कर दिया गया था। शेष अफीम-खसखस के पौधों को भी अलग से मौके पर ही जब्त कर लिया गया था।

इसके बाद, रसाल ने एक रिपोर्ट दर्ज कराई। जिसके आधार पर आरोपी के खिलाफ एनडीपीएस अधिनियम की धारा 8 (बी) रिड विद धारा 18 के तहत एक मामला दर्ज किया गया और आवश्यक जांच के बाद आरोपी के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया।  आरोपी ने अपने अपराध को स्वीकार नहीं किया और तर्क दिया कि उसे गलत तरीके से फंसाया जा रहा है।

17 मई, 2000 को सत्र न्यायाधीश, सतारा ने प्रतिवादी-अभियुक्त को बरी कर दिया,जिसके बाद राज्य ने हाईकोर्ट के समक्ष अपील दायर कर दी।

कोर्ट का फैसला

एपीपी वी.बी कोंडे देशमुख राज्य की ओर से और एस.एस बोरुलकर प्रतिवादी आरोपी के लिए पेश हुए।

शिवाजी रसाल द्वारा दिए गए बयान की जांच के बाद, कोर्ट ने पाया कि-

''एफआईआर को देखने के बाद हमने पाया है कि मुखबिर ने जानकारी दी थी कि कुछ कृषक गांव बावधन में अफीम-खसखस पौधों की अवैध खेती कर रहे हैं।

हालांकि, गवाह नंबर 3 के बयानों से पता चलता है कि कि 25 फरवरी1997 को दो पंचों को उसने राजकीय आबकारी, सतारा के कार्यालय में बुलाया था और उन्हें गांव बावधन के विभिन्न क्षेत्रों में उगाए जाने वाले अफीम-खसखस पौधों के संबंध में प्रस्तावित छापे के बारे में बताया था।

यदि सबूत के इस टुकड़े को ध्यान से पढ़ा जाता है, तो इसका मतलब यह निकलता है कि उसे गाँव बावधन के विभिन्न भागों में अफीम-पोस्ता पौधों की खेती का व्यक्तिगत ज्ञान था।हालाँकि, ऐसा नहीं है।

जैसा कि हमने पहले ही बताया है, सूचना का स्रोत कोई और था। एफआईआर के अनुसार उस स्रोत से जानकारी मिलने के बाद सूचना देने वाला अधीक्षक, राज्य उत्पाद शुल्क के पास गया और उनको इस बारे में सूचित किया।''

न्यायमूर्ति बिष्ट ने यह भी कहा कि भले ही मुखबिर से मिली जानकारी को लिख लिया गया था , फिर भी सूचना देने वाले ने उसे कोर्ट में पेश नहीं किया -

''जब इस गवाह के अनुसार, जानकारी लिख ली गई थी तो सूचना देने वाले-जांच अधिकारी ने चार्जशीट के साथ उक्त लिखित जानकारी दायर क्यों नहीं की थी,यह बात हमारी समझ से परे है।

इतना ही नहीं, उक्त जानकारी और उसके महत्व को रिकॉर्ड करते समय उसके द्वारा अपनाई की गई प्रक्रिया और साधनों पर भी प्रकाश नहीं ड़ाला गया। इसलिए, हमारे पास उक्त जानकारी की शुद्धता या अन्यथा और इसके स्रोत को सत्यापित करने का कोई अवसर नहीं है। यह प्रमुख कमी है जिसने अभियोजन के केस को गहरा धक्का पहुंचाया है।''

इसके अलावा, पीठ ने पंच गवाह प्रदीप भदलकर (पीडब्ल्यू नंबर-1) के बयान को भी देखा और कहा कि-

''पीडब्ल्यू नंबर-1 ने अपने प्रतिपरीक्षण में कहा था कि वह चैथी बार इसी तरह के छापे के संबंध में अपनी गवाही दे रहा है।  उसने कुल सात मामलों में पंच गवाह के रूप में काम किया है।

उसने यह भी बताया कि वह सब-इंस्पेक्टर शिवाजी रसाल (पीडब्ल्यू-3) को जानता है। उसने यह भी बताया कि उसकी उपस्थिति में इस सूचना को लिखा नहीं गया था। उसके अनुसार, वह अंदाजे से भी यह नहीं बता सकता हैं कि उस खेत में कौन सी फसल उगाई गई थी, जहां पर छापे मारे गए थे।''

कोर्ट ने इंगित किया कि इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि एकमात्र गवाह की गवाही (पीडब्ल्यू नंबर 1) से समझौता किया गया है या छेड़छाड़ की गई है-

''यह समझने के लिए बहुत ज्यादा समझ की आवश्कता नहीं है कि यह गवाह एक आदतन पंच गवाह है, इसका कारण यह है कि सूचना देने वाले-जांच अधिकारी से उसकी जान-पहचान है। कथित छापेमारी के समय खड़ी फसलों के बारे में कुछ भी बताने में उसकी असमर्थता यह सब दर्शा रही है।''

जबकि भदलकर के प्रमुख बयान से पता चलता है कि जहां पर छापा मारा गया था उस खेत में कुल 1580 अफीम-खसखस पौधे थे।  जबकि पंचनामा के अनुसार और अभियोजन के अनुसार वहां पर 1558 अफीम-खसखस पौधे थे। तो इस गिनती पर भी उसकी गवाही संदिग्ध है।

अंत में, कोर्ट ने कहा कि

''अगर इस तर्क को मान लिया जाए कि आरोपी के खेत में अफीम-खसखस पौधे पाए गए थे। परंतु न केवल एफआईआर से, बल्कि पंच गवाह पीडब्ल्यू 1 और सूचना देने वाले पीडब्ल्यू 3 की गवाही से भी यह पता चलता है कि छापे के समय आरोपी अपने खेत में उपस्थित नहीं था। इसका एक कारण है और वह कारण हमें पीडब्ल्यू 3 के प्रति परीक्षण से मिला है।''

सूचना देने वाले ने बताया था कि उसे पता चला था कि खेतों का मालिक वास्तव में बॉम्बे में कार्यरत था। प्रतिवादी आरोपी को उसके रिश्तेदारों के माध्यम से संदेश देकर बुलाया गया था।

पीठ ने कहा कि यह अभियोजन पक्ष का मामला नहीं था कि अभियुक्त अपने नौकरों या अपने रिश्तेदारों के माध्यम से इस खेत में खेती करा रहा था।

''हो सकता है कि इस गवाह ने आस-पास के जमीन मालिकों के बयान दर्ज करके इस तथ्य का पता लगाया हो। परंतु हैरानी की बात यह है कि उसके प्रति परीक्षण या जिरह से पता चलता है कि उसने आस-पास के जमीन मालिकों के बयान दर्ज नहीं किए थे। इन परिस्थितियों में सूचना देने वाले के बयान को देखते हुए, केवल इसलिए कि आरोपी खेत का मालिक था,यह नहीं कहा जा सकता है कि खेत विशेष रूप से या पूरी तरह से उसके नियंत्रण में था।

अपराध सिद्ध करने के लिए, अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि आरोपी छापे के समय प्रतिबंधित पौधों, अर्थात् अफीम पोस्ता के पौधों की खेती कर रहा था। अभियोजन पक्ष की ओर से यह साबित करने के लिए कोई सबूत पेश नहीं किया गया कि खेत विशेष रूप से आरोपी के नियंत्रण में था या उसने वास्तव में अफीम-खसखस के पौधों की खेती की है जबकि अफीम के पौधे खेत में पाए गए थे। ''

यह देखते हुए कि अभियोजन पक्ष अपने मामले को साबित करने में पूरी तरह से विफल रहा है,हाईकोर्ट ने राज्य की अपील को खारिज कर दिया।

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