'कानून के प्रति कोई सम्मान नहीं, प्रतिबंधित क्षेत्रों में विरोध-प्रदर्शन बुलाने की आदत': CJP नेताओं की हिरासत बढ़ाने पर एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की टिप्पणी
प्रतिबंधित (डी-नोटिफाइड) जगहों पर बार-बार विरोध-प्रदर्शन बुलाने को कानून के प्रति सम्मान की कमी मानते हुए स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) ने 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (BNSS) की धारा 126 और 170 के तहत चल रही कार्यवाही में CJP नेताओं आशुतोष रंका और सौरव दास की न्यायिक हिरासत 21 अक्टूबर तक बढ़ा दी।
स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ऋतु राज ने 19 अक्टूबर के अपने आदेश में कहा कि दोनों प्रतिवादियों ने जानबूझकर 11 अक्टूबर को भरे गए बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया और तुरंत शांति भंग करने का काम किया।
मजिस्ट्रेट ने टिप्पणी की,
"मेरे सामने पेश किए गए तथ्यों से साफ पता चलता है कि प्रतिवादियों का आचरण सही नहीं है; बल्कि यह कानून के प्रति उनके अनादर को दिखाता है। यह भी बताता है कि उन्हें प्रतिबंधित क्षेत्रों में विरोध-प्रदर्शन बुलाने की आदत है।"
SEM ने आगे कहा कि सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों के बयानों से ऐसा कोई भरोसा नहीं बनता कि वे भविष्य में इस तरह के अपराध नहीं करेंगे। यह निष्कर्ष उनके आचरण और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर निकाला गया।
यह टिप्पणी तब आई जब SEM दिल्ली पुलिस की उस अर्जी पर विचार कर रहे थे, जिसमें प्रतिवादियों की न्यायिक हिरासत को पांच दिन और बढ़ाने की मांग की गई।
जांच अधिकारी ने बताया कि मामले से जुड़े घटनाक्रमों को देखते हुए शांति भंग होने का गंभीर अंदेशा है। इसमें मजिस्ट्रेट के पूर्ववर्ती अधिकारी को मिला एक अज्ञात व्हाट्सएप संदेश या सूचना भी शामिल है, जिसके संबंध में एक अलग 'डेली डायरी' एंट्री भी दर्ज की गई।
पुलिस ने यह भी आरोप लगाया कि प्रतिवादी 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के सदस्य हैं और उन्होंने आम लोगों को इकट्ठा करके जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन करने के लिए उकसाया, जबकि जंतर-मंतर को अब विरोध-प्रदर्शन के लिए निर्धारित जगहों की सूची से हटा दिया गया।
यह भी आरोप लगाया गया कि प्रतिवादियों ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस जैसी उन जगहों पर बार-बार विरोध-प्रदर्शन का आह्वान किया, जो अब विरोध-प्रदर्शन के लिए अधिकृत नहीं हैं। पुलिस ने बताया कि प्रतिवादियों ने अपनी मांगों के समर्थन में 11 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर लोगों को फिर से इकट्ठा होने के लिए कहा था।
इस अर्जी का विरोध करते हुए नेताओं के वकील ने कहा कि उन्हें तुरंत रिहा किया जाना चाहिए और वे आगे ऐसा कोई काम नहीं करेंगे। यह भी तर्क दिया गया कि 10 अक्टूबर के बाद उन्होंने विरोध-प्रदर्शन के लिए कोई अपील नहीं की थी। साथ ही यह भी बताया गया कि AISA की नेता नेहा बोरा और CJP के राष्ट्रीय सह-संयोजक अभिषेक दिपके - जिन्हें पुलिस ने गिरफ्तार किया - उन्हें रिहा कर दिया गया।
दोनों पक्षकारों की दलीलें सुनने के बाद मजिस्ट्रेट ने कहा कि पुलिस की अर्जी के समर्थन में रिकॉर्ड पर ठोस सबूत मौजूद हैं। इससे शांति भंग होने और सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की गंभीर आशंका पैदा होती है, जिसे बिना ठीक से विचार किए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने नेताओं को दो दिनों के भीतर अपना लिखित पक्ष रखने का मौका दिया, और इसकी एक कॉपी जांच अधिकारी को भी देनी होगी।
इसके अलावा, मजिस्ट्रेट ने पाया कि नेताओं की ओर से पेश किए गए जमानतदार (Sureties) स्वीकार करने लायक नहीं हैं, क्योंकि उनके पहचान दस्तावेजों में कमियां थीं और निजी जानकारी के बारे में उनके जवाब संतोषजनक नहीं थे। प्रतिवादियों को नए जमानतदार पेश करने का निर्देश दिया गया।
इस मामले की अगली सुनवाई 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजे होगी, जब प्रतिवादियों को अदालत के सामने पेश किया जाएगा।
Case Title : State v Ashutosh Ranka & Saurav Das