ट्रिपल तलाक को वैध ठहराने की मांग वाली याचिका खारिज, हाईकोर्ट ने कहा- 'बेतुकी, परेशान करने वाली'

Update: 2026-05-14 13:00 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम व्यक्ति की याचिका खारिज की, जिसमें उसने अपनी पत्नी को दिए गए ट्रिपल तलाक के ज़रिए तलाक की घोषणा करने की मांग की थी।

जस्टिस विवेक जैन की बेंच ने टिप्पणी की कि यह याचिका 'परेशान करने वाली और बेतुकी' थी, क्योंकि कानून के अनुसार ऐसी कोई भी घोषणा नहीं की जा सकती है।

"मौजूदा मामले में दायर मुकदमा ट्रिपल तलाक के आधार पर घोषणा की मांग करने वाला मुकदमा है। शायरा बानो (उपरोक्त) मामले में दिए गए फैसले को देखते हुए ऐसी कोई भी घोषणा नहीं की जा सकती है।"

यह विवाद पति द्वारा दायर एक मुकदमे से शुरू हुआ था, जिसमें उसने यह घोषणा करने की मांग की थी कि उसने 14 जनवरी, 2015 को ट्रिपल तलाक के ज़रिए अपनी पत्नी को कानूनी रूप से तलाक दे दिया था। पति के अनुसार, पत्नी ने उसके साथ मानसिक क्रूरता की थी, जिसके बाद उसने दो गवाहों की मौजूदगी में ट्रिपल तलाक दिया और बाद में डाक के ज़रिए उसे तलाकनामा भेज दिया।

इस मुकदमे के लंबित रहने के दौरान, 2017 में शायरा बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक, मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करने वाला करार देते हुए रद्द किया था।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पत्नी ने CPC के आदेश 7 नियम 11 के तहत आवेदन दायर किया, जिसमें उसने इस आधार पर मुकदमा खारिज करने की मांग की कि ट्रिपल तलाक पर आधारित घोषणा कानून द्वारा वर्जित है।

शुरुआत में, सिविल कोर्ट ने 2018 में उसकी याचिका खारिज की थी, यह मानते हुए कि शायरा बानो का फैसला भविष्यलक्षी (Prospectively) रूप से लागू होता है और 22 अगस्त, 2017 से पहले दिए गए कथित तलाक पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

बाद में, जब मामला फैमिली कोर्ट में स्थानांतरित हुआ तो पत्नी ने यह तर्क देते हुए फिर से मुकदमे को खारिज करने की मांग की कि कानून की न्यायिक व्याख्या आमतौर पर भूतलक्षी (retrospective) होती है, जब तक कि स्पष्ट रूप से अन्यथा न कहा गया हो।

इस आपत्ति का सामना करते हुए पति ने 2023 में अपने मुकदमे में संशोधन किया और अपना रुख बदल लिया। उसने दावा किया कि तलाक 14 जनवरी, 2015 को एक ही बैठक में दिया गया तत्काल ट्रिपल तलाक नहीं था, बल्कि वास्तव में यह अलग-अलग चरणों में हुआ था। पहला तलाक़ 25 नवंबर, 2013 को, और दूसरा व तीसरा तलाक़ 28 मई, 2014 को हुआ।

उन्होंने यह तर्क दिया कि तलाक़ असल में 2014 में ही हो चुका था, इसलिए यह 'इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़' (एक साथ तीन तलाक़) पर लगी रोक के दायरे में नहीं आता।

अदालत ने पाया कि मूल दस्तावेज़ और 'तलाक़नामा' में साफ़ तौर पर सिर्फ़ 14 जनवरी, 2015 को दिए गए तीन तलाक़ का ही ज़िक्र था। बेंच ने टिप्पणी की कि विचाराधीन मुक़दमा 'बेतुका और आधारहीन' मुक़दमा है, जिसमें 'मौखिक तीन तलाक़' के आधार पर कोई घोषणा (Declaration) किए जाने की मांग की गई, जबकि क़ानून के तहत ऐसी कोई घोषणा नहीं की जा सकती।

बेंच ने ज़ोर देकर कहा,

"क़ानून में यह बात पूरी तरह से तय है कि CPC के 'आदेश 7 नियम 11' के तहत मिली अधिकार-सीमा का इस्तेमाल करके किसी भी 'परेशान करने वाले और बेतुके' मुक़दमे को ख़त्म किया जा सकता है। विचाराधीन मुक़दमा भी इसी तरह का एक 'परेशान करने वाला और बेतुका' मुक़दमा है, जिसमें 'मौखिक तीन तलाक़' के आधार पर घोषणा की मांग की गई। क़ानून के अनुसार ऐसी कोई घोषणा नहीं की जा सकती।"

इसलिए वादी द्वारा दायर अर्ज़ी (plaint) में मांगी गई राहत CPC के 'आदेश 7 नियम 11' के तहत मिली अधिकार-सीमा के कारण स्वीकार्य नहीं है। नतीजतन, बेंच ने पति द्वारा दायर अर्ज़ी ख़ारिज की। साथ ही उसे यह आज़ादी भी दी कि वह क़ानून के तहत उपलब्ध किसी अन्य आधार पर तलाक़ की मांग कर सकता है।

Case Title: Smt Rubina Kavi v Rizvan Ali, CR-773-2024, Smt Rubina Quavi v Rizvan Ali, Misc Petition 5464 of 2024

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