मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, इंदौर खंडपीठ ने हाल ही में राज्य को COVID-19 ड्यूटी के दौरान दुर्घटना में मृत आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की बेटी को मुख्यमंत्री COVID-19 योद्धा कल्याण योजना योजना के तहत 50 लाख रुपये के बीमा धन का भुगतान करने का निर्देश दिया।

मामले के तथ्य यह थे कि याचिकाकर्ता की मां COVID-19 की पहली लहर के दौरान अपने गांव में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में सेवा दे रही थी। अपने कर्तव्यों के एक भाग के रूप में वह लोगों को पौष्टिक भोजन वितरित करने के रास्ते में थी जब वह एक पत्थर से टकरा गई और घायल हो गई। बाद में उसने अस्पताल में दम तोड़ दिया।

याचिकाकर्ता ने मुख्यमंत्री COVID-19 योद्धा कल्याण योजना के तहत मुआवजे का लाभ उठाने के लिए राज्य के अधिकारियों के समक्ष आवेदन दिया। महामारी के दौरान COVID-19 कर्तव्यों का पालन करते हुए मरने वाले अपने कर्मचारियों के परिवार को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए राज्य सरकार द्वारा यह योजना शुरू की गई है। हालांकि, उसके दावे को इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि योजना के उद्देश्य के लिए उसकी मां की मृत्यु "दुर्घटना" नहीं थी और प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं को पूरा नहीं किया गया। परेशान होकर याचिकाकर्ता ने कोर्ट का रुख किया।

अपने मामले पर बहस करते हुए याचिकाकर्ता ने प्रस्तुत किया कि "दुर्घटना" शब्द को पॉलिसी दस्तावेज़ में परिभाषित नहीं किया गया। यह दावा किया गया कि मामले के तथ्यों को देखते हुए जिस घटना के कारण उसकी मां की मृत्यु हुई, उसे वास्तव में एक दुर्घटना माना जाएगा। प्रक्रियात्मक आवश्यकता के संबंध में यह बताया गया कि नीति के अनुसार, आकस्मिक मृत्यु के मामले में एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए और पोस्टमॉर्टम किया जाना चाहिए। लेकिन उसकी मां के मामले में दोनों में से किसी की भी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि चोट की जटिलताओं के कारण दुर्घटना के 24 दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई थी। इसलिए यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता को राज्य द्वारा योजना के लाभों से गलत तरीके से वंचित किया गया।

इसके विपरीत राज्य ने तर्क दिया कि केवल जमीन पर गिरने को दुर्घटना नहीं कहा जा सकता। आगे यह भी कहा गया कि चूंकि पॉलिसी के तहत निर्धारित शर्तों को पूरा नहीं किया गया, इसलिए याचिकाकर्ता योजना का लाभ लेने के लिए पात्र नहीं है।

जस्टिस सुबोध अभ्यंकर की पीठ ने पक्षकारों के प्रस्तुतीकरण और रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों की जांच करते हुए याचिकाकर्ता की दलीलों में योग्यता पाई। राज्य द्वारा दिए गए तर्कों को खारिज करते हुए न्यायालय ने कहा कि हर दुर्घटना के लिए एफआईआर दर्ज करने की आवश्यकता नहीं होगी।

ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार इस बात से चूक गई है कि जरूरी नहीं कि सभी दुर्घटनाओं में एफआईआर और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ही हो। संक्षिप्त ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी 'दुर्घटना' शब्द को" 1. एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना जो अप्रत्याशित रूप से और अनजाने में होती है; 2. कुछ ऐसा होता है जो संयोग से या बिना किसी स्पष्ट कारण के होता है।"

इस प्रकार इस अदालत की सुविचारित राय में योजना के लाभ का विस्तार करते समय उत्तरदाताओं को 'दुर्घटना' शब्द की उक्त विस्तारित परिभाषा को ध्यान में रखना आवश्यक है और योजना की प्रयोज्यता को प्रतिबंधित करने के लिए मायोपिक दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए। केवल उन मामलों में योजना जहां प्राथमिकी दर्ज की गई है और पोस्टमॉर्टम किया गया।

नीति दस्तावेज़ का अवलोकन करते हुए न्यायालय ने कहा कि योजना का अंतर्निहित उद्देश्य राज्य सरकार के उन कर्मचारियों के परिवार को वित्तीय सहायता प्रदान करना है, जिनकी महामारी के दौरान COVID-19 कर्तव्यों का पालन करते हुए मृत्यु हो गई। इसलिए न्यायालय ने कहा कि केवल प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं को पूरा न करने से योजना का मूल उद्देश्य ओवरराइड नहीं होगा।

कोर्ट ने कहा,

योजना के सावधानीपूर्वक अवलोकन पर अर्थात "मुख्यमंत्री COVID-19 योद्धा कल्याण योजना" और उसी का अंतर्निहित उद्देश्य, जो राज्य सरकार के कर्मचारियों के परिवार के सदस्यों को कुछ सहायता प्रदान करना है, जिनकी मृत्यु कोविद के दौरान COVID-19 कर्तव्यों का पालन करते हुए हुई थी। इस न्यायालय का सुविचारित मत है कि जहां तक ​​किसी कर्मचारी की आकस्मिक मृत्यु के संबंध में प्रस्तुत किए जाने वाले दस्तावेजों की आवश्यकताओं का संबंध है, वही प्रकृति में केवल प्रक्रियात्मक है और मौलिक को ओवरराइड करने के लिए नहीं कहा जा सकता।

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि में नीति की प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं की जांच करते हुए न्यायालय ने कहा कि उक्त शर्तों में याचिकाकर्ता के मामले में ऐसी स्थिति की परिकल्पना नहीं की गई है।

कोर्ट ने इस संबंध में कहा,

ये स्थितियां स्पष्ट रूप से उस स्थिति की परिकल्पना नहीं करती हैं, क्योंकि वर्तमान मामले में जहां मृतक कर्मचारी की मृत्यु COVID-19 कर्तव्यों का पालन करते हुए आकस्मिक रूप से गिरने से हुई है और बाद में इसकी जटिलताओं के कारण उस पर उक्त चोट लगने के 24 दिनों के भीतर उसकी मृत्यु हो गई है। जाहिरा तौर पर उसका जमीन पर गिरना किसी व्यक्ति की किसी लापरवाही के कारण नहीं है, बल्कि उसकी बुरी किस्मत के कारण है कि वह पत्थर से टकरा गई। किसी भी मामले में जब कोई व्यक्ति जमीन पर गिर जाता है तो इस उम्मीद में एफआईआर दर्ज करने की आवश्यकता नहीं होती कि वह उक्त गिरावट में चोटों के कारण दम तोड़ देगा और जब इस तरह के घायल की अस्पताल में मृत्यु हो जाती है तो उसकी चोट का इलाज किया जाता है। परिणामी जटिलताओं, उसका पोस्टमॉर्टम भी आवश्यक नहीं है, क्योंकि यह अन्यथा मेडिको लीगल मामला नहीं है।

उपरोक्त टिप्पणियों के साथ न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता को योजना का लाभ देने से राज्य का इनकार अनुचित और अन्यायपूर्ण है। तदनुसार, याचिका की अनुमति दी गई और राज्य को योजना के तहत वादे के अनुसार याचिकाकर्ता को 50 लाख रुपये की राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया गया।

केस टाइटल: एम.एस. लक्ष्मी बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य।

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