अलीपुर की सिविल कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा को मनोज अग्रवाल के खिलाफ कथित मानहानिकारक बयान प्रकाशित करने, दोबारा पोस्ट करने, शेयर करने या दोहराने से रोक दिया। इन बयानों में उन्हें "वोट चोर" कहा गया और उन पर आरोप लगाया गया कि वे मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) के दौरान मतदाताओं को अवैध रूप से मताधिकार से वंचित करने के लिए जिम्मेदार है।

अलीपुर की सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की पहली अदालत ने अग्रवाल की याचिका पर एकतरफा अंतरिम आदेश (ex parte ad-interim injunction) जारी किया। अदालत ने मोइत्रा को निर्देश दिया कि वह अपने X (ट्विटर) अकाउंट @MahuaMoitra पर 3 अक्टूबर और 6 अक्टूबर 2026 को की गई दो पोस्ट को, आदेश मिलने के 24 घंटे के भीतर हटा दें।

अदालत ने मोइत्रा, उनके एजेंटों, कर्मचारियों और उनकी ओर से काम करने वाले अन्य सभी लोगों को किसी भी प्लेटफॉर्म पर इन बयानों को फिर से प्रकाशित करने से रोक दिया। इस आदेश के दायरे में वे बयान आते हैं, जिनमें आरोप लगाया गया कि अग्रवाल ने "हर तरह की अवैध काम किए", मतदाताओं को अवैध रूप से मताधिकार से वंचित करने के लिए "अकेले जिम्मेदार" थे, या किसी "मालिक" के इशारे पर काम कर रहे थे।

हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि इस आदेश का मतलब यह नहीं है कि SIR प्रक्रिया या किसी आधिकारिक फैसले की निष्पक्ष आलोचना नहीं की जा सकती।

अदालत ने आगे निर्देश दिया कि यदि मोइत्रा तय समय के भीतर उन दो पोस्ट को नहीं हटाती हैं, तो अग्रवाल के पास यह विकल्प होगा कि वे इस आदेश की जानकारी X Corp. और उसके शिकायत अधिकारी (Grievance Officer) को दें। इसके तहत सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के नियम 3(1)(d) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79(3)(b) के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

इस आदेश के तहत अग्रवाल को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे आदेश पारित होने के 24 घंटे के भीतर मोइत्रा को शिकायत की प्रति, निषेधाज्ञा (Injunction) आवेदन, शपथ पत्र और अन्य सहायक दस्तावेज उपलब्ध कराएं। यह प्रक्रिया 'सिविल प्रक्रिया संहिता' (Code of Civil Procedure) के आदेश XXXIX नियम 3 के अनुसार पूरी की जानी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियाँ केवल अंतरिम आवेदन पर निर्णय लेने के उद्देश्य से मामले के प्रथम दृष्टया आकलन पर आधारित थीं। इन टिप्पणियों से अदालत बाद की सुनवाई या मुकदमे के दौरान बंधी नहीं होगी।

मोइत्रा को अपनी लिखित आपत्तियां और सहायक दस्तावेज़ दाखिल करने की छूट दी गई। वह 'कोड ऑफ सिविल प्रक्रिया' (दीवानी प्रक्रिया संहिता) के आदेश XXXIX नियम 4 के तहत निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) को हटाने, उसमें बदलाव करने या उसे रद्द करने के लिए भी आवेदन कर सकती हैं।

यह अंतरिम आदेश, अदालत द्वारा तय की गई तारीख तक अगले आदेशों के आने तक लागू रहेगा। इस मामले को 5 जनवरी, 2027 के लिए सूचीबद्ध किया गया है, जिसमें नोटिस तामील करने से जुड़ी औपचारिकताएं पूरी करना, लिखित आपत्तियाँ दाखिल करना और अस्थायी निषेधाज्ञा के आवेदन पर सुनवाई शामिल होगी।

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