फैमिली ट्रस्ट मामले में मल्लिकार्जुन खड़गे को राहत, हाईकोर्ट ने शिकायत को आगे बढ़ाने की अनुमति देने वाला आदेश वापस लिया
कर्नाटक हाईकोर्ट ने शुक्रवार (16 अक्टूबर) को 'सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट' को जमीन आवंटन के मामले में अपने पहले के आदेश को वापस लेने की मांग वाली अर्जी स्वीकार की। कोर्ट ने तय किया कि इस मामले में आगे बढ़ने से पहले वह मल्लिकार्जुन खड़गे और उनके परिवार के अन्य सदस्यों का पक्ष सुनेगा।
जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की सिंगल बेंच ने खड़गे परिवार की ओर से दायर एक अर्जी पर यह आदेश दिया। खड़गे परिवार का तर्क था कि पिछला आदेश पारित करने से पहले उनका पक्ष नहीं सुना गया।
कोर्ट ने अपना पिछला आदेश वापस ले लिया और निर्देश दिया कि इस मामले में प्रतिवादी 2 से 6 (Respondents 2 to 6) - जिनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री और राज्यसभा में विपक्ष के मौजूदा नेता मल्लिकार्जुन खड़गे भी शामिल हैं - का पक्ष सुना जाए।
आदेश का मुख्य हिस्सा सुनाते हुए कोर्ट ने कहा:
“आदेश को वापस लेने की अर्जी मंजूर की जाती है। प्रतिवादी 2 से 6 का पक्ष सुनने के लिए [तारीख] का आदेश वापस लिया जाता है। अगली सुनवाई 30 अक्टूबर को होगी। तब तक संबंधित कोर्ट [ट्रायल कोर्ट] इस मामले में कोई आगे की कार्रवाई नहीं करेगा।”
इस तरह 30 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई तक ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही रुकी रहेगी।
इससे पहले के आदेश में 'सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट' को एक 'सिविक एमेनिटी साइट' (सार्वजनिक सुविधा वाली जगह) के आवंटन में कथित अनियमितताओं से जुड़ी एक निजी शिकायत को आगे बढ़ाने की अनुमति दी गई। इस ट्रस्ट के ट्रस्टियों में खड़गे और उनके परिवार के सदस्य शामिल हैं।
हाईकोर्ट ने माना था कि शिकायत के साथ लगा हलफनामा (Affidavit) अगर त्रुटिपूर्ण है तो 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (BNSS) की धारा 175(3) के तहत इसे सुधारा जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी किसी कमी का इस्तेमाल जांच की कानूनी प्रक्रिया से बचने के लिए नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“लगाए गए आरोप अंत में सच भी साबित हो सकते हैं, और बेबुनियाद भी... लेकिन यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि जिन आरोपों की जांच होनी चाहिए, वे केवल इसलिए बिना जांच के रह जाएं क्योंकि शिकायत के साथ लगे हलफनामे में कोई ऐसी कमी थी, जिसे सुधारा जा सकता था। एक त्रुटिपूर्ण 'सत्यापन खंड' (Verification Clause) की वजह से सच सामने आने से नहीं रुकना चाहिए।”
यह पिछला आदेश उस चुनौती पर विचार करते हुए पारित किया गया, जिसमें ट्रायल कोर्ट के ऐसे आदेश को चुनौती दी गई, जिसने ज़मीन आवंटन के आरोपों की आगे जांच करने से इनकार किया।
यह निजी शिकायत 'लांचमुक्ता कर्नाटक वेदिके' संगठन के अध्यक्ष द्वारा दायर की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि बेंगलुरु विकास प्राधिकरण (BDA) द्वारा एक ट्रस्ट को 'नागरिक सुविधा स्थल' (civic amenity site) आवंटित करने में अनियमितताएं बरती गईं।
शिकायत के अनुसार, ट्रस्ट ने कथित तौर पर खुद को अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के सदस्यों द्वारा संचालित संस्था के रूप में पेश किया, ताकि बनशंकरी 6वें चरण में SC कोटे के तहत 'नागरिक सुविधा स्थल' हासिल किया जा सके। यह भी आरोप लगाया गया कि ट्रस्ट ने लीज़ की रकम में 50 प्रतिशत की छूट प्राप्त की और बाद में BTM 4वें चरण में एक वैकल्पिक जगह हासिल कर ली, जिसकी कीमत कथित तौर पर लगभग 130 करोड़ रुपये है। साथ ही तीन साल तक कोई निर्माण कार्य न करने के बावजूद, उन्होंने पहली वाली ज़मीन भी अपने पास ही रखी।
शिकायतकर्ता ने संबंधित पुलिस, लोकायुक्त के पुलिस अधीक्षक और राज्यपाल से संपर्क करके कार्रवाई की मांग की। इसमें 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988' की धारा 17A के तहत मंजूरी (Sanction) दिलाना भी शामिल था। बाद में, जब अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की तो उन्होंने BNSS की धारा 175(3) के तहत जांच की मांग करते हुए निजी शिकायत दायर की।
ट्रायल कोर्ट ने BNSS की धारा 175(3) के तहत जांच की मांग पर आगे बढ़ने से इनकार किया, क्योंकि शिकायतकर्ता के हलफनामे में ज़रूरी सत्यापन (Verification) मौजूद नहीं था। इसके बजाय, कोर्ट ने निर्देश दिया कि शिकायतकर्ता से पूछताछ की जाए और BNSS की धारा 223 के तहत एक अदालती जांच (Court Inquiry) कराई जाए।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने उस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया।
बाद में खड़गे परिवार ने हाई कोर्ट से अपना आदेश वापस लेने (Recall) की मांग की। उनका तर्क था कि आदेश पारित करने से पहले उनका पक्ष नहीं सुना गया।
अब हाईकोर्ट ने प्रतिवादी 2 से 6 (Respondents 2 to 6) का पक्ष सुनने के लिए उस आदेश को वापस ले लिया।
इस मामले की अगली सुनवाई 30 अक्टूबर को होगी।
Case Title : Sri Vijayaraghava Marathe v. Shri Mallikarjun Kharge & Ors