कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपनी दो महीने की बच्ची की नदी में फेंक कर हत्या करने की आरोपी महिला को बरी किया

Update: 2022-06-28 04:45 GMT

Karnataka High Court

कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में अपनी दो महीने की बेटी को नदी में फेंककर हत्या करने के मामले में उम्रकैद की सजा पाई एक महिला को राहत देते हुए उसके दोषसिद्धि के फैसले और सजा के आदेश को रद्द कर दिया है। बच्ची मिर्गी और सांस की कुछ समस्याओं से पीड़ित थी।

जस्टिस केएस सोमशेखर और जस्टिस शिवशंकर अमरन्नावर की खंडपीठ ने आरोपी कविता को बरी कर दिया है,जो पिछले छह साल से भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत अपराध करने के मामले में जेल में बंद है। पीठ ने निर्देश दिया है कि अगर वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो तो उसे तत्काल जेल से रिहा कर दिया जाए।

बच्ची के पिता मंजूनाथ द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर आपराधिक कानून लागू किया गया था।

अभियोजन पक्ष ने 15 गवाहों को पेश किया जबकि आरोपी ने इन सभी साक्ष्यों को गलत बताया। हालांकि, उसने अपने बचाव में कोई साक्ष्य नहीं पेश किया।

इसके बाद, ट्रायल कोर्ट ने बच्चे के डॉक्टर, उसके शव का परीक्षण करने वाले डॉक्टर और जांच अधिकारी के साक्ष्य पर बहुत भरोसा करते हुए,यह निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष ने आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 के तहत दंडनीय अपराध के लिए अपना मामला साबित कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि उसके सामने पेश की गई परिस्थितियों और सबूतों को देखते हुए घटनाओं की पूरी श्रृंखला से केवल एक ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आरोपी ने बच्ची को नदी में फेंक दिया और उसे मार डाला।

अपील में महिला के वकील आरपी चंद्रशेखर ने दलील दी कि इस मामले में शिकायत करने वाले आरोपी के पति और बच्ची के पिता अपने बयान से मुकर गए हैं। आगे यह भी कहा गया कि उसकी बच्ची के डॉक्टर के साक्ष्य अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन नहीं करते हैं जिससे यह साबित हो सके कि वह ही अपनी बच्ची की मौत का कारण बनी है।

इसके अलावा, यह तर्क दिया गया कि अभियोजन पक्ष द्वारा अंतिम बार देखे गए सिद्धांत को साबित करने के लिए जिन गवाहों को पेश किया गया था, वे भी मुकर गए थे और अभियोजन पक्ष का समर्थन नहीं किया था।

दूसरी ओर अतिरिक्त एसपीपी विजयकुमार मजागे ने कहा कि आरोपी ने बच्ची को इसलिए फेंका क्योंकि उसे सांस लेने में तकलीफ और मिर्गी की समस्या थी। उसके पास बच्ची को पिलाने के लिए पर्याप्त दूध भी नहीं था। यह भी तर्क दिया गया कि आरोपी को अच्छी तरह से पता था कि दो महीने का बच्चा नदी में डूब जाएगा और उसने उसे मारने के इरादे से ही फेंका था।

निष्कर्षः

बेंच ने ललित कुमार व अन्य बनाम अधीक्षक और स्मरणकर्ता, एआईआर 1989 एससी 2134 के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले का हवाला दिया,जिसमें यह माना गया है कि दोषमुक्ति के खिलाफ दायर अपीलों के मामलों में साक्ष्य की समीक्षा करने की अपीलीय न्यायालय की शक्ति उतनी ही व्यापक है जितनी कि दोषियों के खिलाफ दायर अपील के मामले में होती है,लेकिन अपीलीय न्यायालय को सभी उचित संदेह से परे आरोपी के खिलाफ अपराध साबित करने के लिए अपने स्तर पर सबूतों की समीक्षा और पूरे सबूतों पर दोबारा गौर करने के साथ-साथ दस्तावेजों को चिह्नित करना चाहिए।

इसके बाद कोर्ट ने कहा, ''मौजूदा मामले में, ट्रायल कोर्ट ने पीडब्ल्यू-3 (बच्चे के डॉक्टर), पीडब्ल्यू-14 (शव परीक्षण करने वाले डॉक्टर) और पीडब्ल्यू-15 (जांच अधिकारी) के साक्ष्य को अधिक महत्व दिया है।''

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि यह साक्ष्य की गुणवत्ता है न कि साक्ष्य की मात्रा जिस पर न्यायालय की राय को तौलना चाहिए। इसके अलावा, यह भी कहा कि एक गवाह के एकान्त बयान पर तभी विचार किया जा सकता है जब अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह बयान सत्य है और मामले का सही वर्णन करता है।

कोर्ट ने कहा कि,

''मौजूदा मामले में, आरोपी ने ही मृतक की हत्या की थी,इस संबंध में अभियोजन द्वारा पेश किए गए सबूतों की पुष्टि का महत्व सकारात्मक, ठोस, सुसंगत और संभावित होना चाहिए। लेकिन तत्काल मामले में, कविता कोई ओर नहीं बल्कि स्वंय उस दो महीने की उम्र के मृत बच्चे की मां है, हालांकि उसके बावजूद अभियोजन पक्ष ने इस आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाया है और पीडब्ल्यू-1 से लेकर पीडब्ल्यू-15 तक को बतौर गवाह पेश किया। लेकिन भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 302 के तहत अपराध के लिए अभियुक्त की दोषसिद्धि साबित करने के लिए अभियोजन ने कोई सार्थक सबूत पेश नहीं किया।''

तदनुसार कोर्ट ने माना, ''इसलिए, इस अपील में हस्तक्षेप की आवश्यकता है। यदि सबूतों, दोषसिद्धि के फैसले और सजा के आदेश पर फिर से विचार करके हस्तक्षेप नहीं किया जाता है, तो निश्चित रूप से अभियुक्त के साथ ठीक से न्याय नहीं हो पाएगा,जिस पर गंभीर लगाए गए हैं।''

केस टाइटल-कविता बनाम कर्नाटक राज्य

केस नंबर- आपराधिक अपील संख्या 1372/2017

साइटेशन- 2022 लाइव लॉ (केएआर) 230

आदेश की तारीख- 8 जून, 2022

प्रतिनिधित्व- एडवोकेट आरपी चंद्रशेखर और एडवोकेट सी.एच.हनुमंतराय अपीलकर्ता के लिए ; अतिरिक्त एसपीपी विजयकुमार मजागे, प्रतिवादी के लिए

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