सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस अभय ओक ने कहा कि जिला अदालतें आम नागरिकों के लिए न्याय व्यवस्था से सीधे जुड़ने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम हैं और वहां प्रैक्टिस करने वाले वकील न्याय व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। उन्होंने युवा वकीलों से कानून की बुनियादी समझ के साथ-साथ अदालती प्रक्रिया और पेशेवर कौशल को लगातार मजबूत करने का आह्वान किया।

जस्टिस अभय ओक पुणे के आईएलएस लॉ कॉलेज में विधि शिक्षा के सतत कार्यक्रम के उद्घाटन के अवसर पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि वकालत के क्षेत्र में सफलता के लिए मेहनत सबसे महत्वपूर्ण है। युवा वकीलों को विधि के मूल सिद्धांतों के साथ प्रक्रियात्मक कानून में भी मजबूत पकड़ बनाने का लगातार प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जिला और तालुका अदालतें न्याय वितरण व्यवस्था की नींव हैं। आम नागरिक सबसे पहले और सबसे सीधे इन्हीं अदालतों के माध्यम से न्याय व्यवस्था का अनुभव करता है। निचली अदालत में किसी मामले की सुनवाई के दौरान हुई गलती का असर पूरे मामले पर पड़ सकता है। इसलिए युवा वकीलों को निचली अदालतों में वकालत को अपने पेशे की महत्वपूर्ण आधारशिला के रूप में देखना चाहिए।

जस्टिस ओक ने युवा वकीलों को सलाह दी कि केवल किताबें पढ़कर वकालत नहीं सीखी जा सकती। इसके लिए अनुभवी वकीलों और जजों को अदालत में ध्यान से सुनना और उनकी कार्यशैली को समझना भी जरूरी है। उन्होंने वकीलों से जिज्ञासु बने रहने, सवाल पूछने और मुकदमे की अलग-अलग प्रक्रियाओं से जुड़े नियमों व प्रावधानों को अच्छी तरह समझने की अपील की।

उन्होंने प्रक्रियात्मक कानून के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि प्रभावी वकालत के लिए केवल कानून की जानकारी पर्याप्त नहीं है। वकील को अदालत की कार्यप्रणाली और मुकदमे के अलग-अलग चरणों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया की भी पूरी जानकारी होनी चाहिए।

पेशेवर आचरण और वकालत की गरिमा पर जोर देते हुए जस्टिस ओक ने कहा कि वकीलों को अदालत की गरिमा बनाए रखने के साथ जजों और न्यायिक संस्था का सम्मान करना चाहिए। अदालत में अनावश्यक आक्रामकता से बचते हुए अपनी दलील मजबूती और प्रभावी तरीके से, लेकिन पूरी गरिमा के साथ रखनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि वकीलों की अपने मुवक्किलों के प्रति ईमानदार और निष्पक्ष रहने की जिम्मेदारी है।

कार्यक्रम में सीनियर एडवोकेट एस. वी. कानेटकर ने जजों और वकीलों को “न्याय व्यवस्था के दो पहिए” बताया। उन्होंने कहा कि जनता का न्यायपालिका पर गहरा विश्वास है और वकीलों की जिम्मेदारी है कि वे मामलों को प्रभावी ढंग से अदालत के सामने रखें तथा न्यायपूर्ण निर्णय तक पहुंचने में अदालत की सहायता करें।

कानेटकर ने युवा वकीलों को लगातार अदालत में काम करने और व्यावहारिक अनुभव हासिल करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि निरंतर अदालती अभ्यास से कानूनी समझ और पेशेवर क्षमता मजबूत होती है।

भारतीय विधि सोसायटी की मानद सचिव वैजयंती जोशी ने संस्था के 103 साल के इतिहास और विधि शिक्षा तथा कानूनी पेशे में उसके योगदान की जानकारी दी।

कार्यक्रम की परियोजना निदेशक और आईएलएस लॉ कॉलेज की प्रभारी प्राचार्य डॉ. दीपा पाटुरकर ने सतत विधि शिक्षा कार्यक्रम की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम ऑनलाइन और प्रत्यक्ष, दोनों माध्यमों से संचालित किया जाएगा। महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों से शुरुआती दौर के 150 वकीलों को छह महीने के इस कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रत्येक समूह में 30 वकील शामिल होंगे।

कार्यक्रम का संचालन परियोजना प्रबंधक ह्रुचा धामधेरे ने किया और अंत में आभार व्यक्त किया।

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