तीन दशक की न्यायिक यात्रा के बाद दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस सी सुधा हुईं रिटायर, बोलीं- “कुछ अनुभव हमें मजबूत बनाते हैं”
दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस सी. चंद्रशेखरन सुधा गुरुवार को तीन दशक से अधिक लंबी न्यायिक यात्रा के बाद रिटायर हो गईं। विदाई समारोह में भावुक होते हुए उन्होंने अपने करियर के उन अनुभवों को याद किया, जिन्होंने तिरुवनंतपुरम की एक युवा वकील से दिल्ली हाईकोर्ट की जज बनने तक के उनके सफर को आकार दिया।
अपने विदाई संबोधन में जस्टिस सुधा ने कहा,
“कुछ अनुभव हमें प्रोत्साहित करते हैं। कुछ हमारी परीक्षा लेते हैं। कुछ हमें मजबूत बनाते हैं। इन सभी अनुभवों ने अपने-अपने तरीके से उस व्यक्ति और जज को बनाने में योगदान दिया, जो मैं बनी।”
जस्टिस सुधा ने जनवरी 1989 में वकालत शुरू की थी। अप्रैल 1995 में वह जिला न्यायपालिका में शामिल हुईं और 25 साल से अधिक समय तक वहां सेवा देने के बाद 2021 में केरल हाईकोर्ट की जज बनीं। अक्टूबर 2021 में उन्हें केरल हाईकोर्ट का अतिरिक्त जज नियुक्त किया गया था। बाद में 28 अक्टूबर 2025 को उनका तबादला दिल्ली हाईकोर्ट किया गया।
दिल्ली हाईकोर्ट में अपने कार्यकाल को याद करते हुए जस्टिस सुधा ने कहा कि यहां उन्हें “बड़ा कैनवास” मिला और काम करने के लिए “स्पेस और स्वतंत्रता” भी मिली।
अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए उन्होंने बताया कि कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अपने दादा के नक्शेकदम पर कानून का पेशा चुना। उनके दादा 1940 और 1950 के दशक में न्यायपालिका में रहे थे। जनवरी 1989 में उन्होंने वकील के रूप में नामांकन कराया और तिरुवनंतपुरम की जिला अदालतों में प्रैक्टिस शुरू की।
उन्होंने बताया कि उनके वरिष्ठ ने उन्हें केवल कानून नहीं सिखाया, बल्कि एक वकील के लिए जरूरी अनुशासन भी सिखाया।
जस्टिस सुधा ने कहा कि उन्हें कभी तैयार सामग्री पर निर्भर नहीं बनाया गया, बल्कि उन्हें मुकदमों की फाइलें दी जाती थीं और खुद तैयारी कर ट्रायल करने तथा बहस करने के लिए कहा जाता था।
अपने वरिष्ठ से मिली सीख को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें सिखाया गया कि अदालत में विपक्षी पक्ष को बीच में नहीं रोकना है, आवाज ऊंची नहीं करनी है और मामले के परिणाम चाहे जो हों, अदालत में कभी भी भावनाओं का प्रदर्शन नहीं करना है।
जस्टिस सुधा का दिल्ली से जुड़ाव 1991-92 में हुआ, जब शादी के बाद वह दिल्ली आई थीं। दिल्ली हाईकोर्ट से जुड़ी अपनी पहली याद साझा करते हुए उन्होंने बताया कि एक बार वह और उनके पति हाईकोर्ट के बाहर सड़क से गुजर रहे थे। एक पुलिसकर्मी ने उनकी गाड़ी रोक दी, जबकि एक जज की गाड़ी वहां से निकलकर हाईकोर्ट परिसर में चली गई।
उन्होंने कहा कि उस समय उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन वह भी उसी तरह हाईकोर्ट परिसर में प्रवेश करेंगी और इस अदालत की बेंच का हिस्सा बनेंगी।
जिला न्यायपालिका में अपने 25 से अधिक वर्षों के कार्यकाल को उन्होंने “चुनौतीपूर्ण और घटनापूर्ण” बताया। उन्होंने कहा कि यह सफर आसान नहीं था, लेकिन ऐसा भी नहीं था कि इसमें केवल कठिनाइयां ही थीं। उन्होंने उन वर्षों का भरपूर आनंद लिया, हालांकि न्यायिक करियर के दौरान कई बार उन्हें और उनके पति को एक-दूसरे से दूर रहना पड़ा।
अपने दिवंगत पति को याद करते हुए जस्टिस सुधा भावुक हो गईं। उन्होंने बताया कि उनके पति का 2015 में अचानक निधन हो गया था और उन्होंने उन्हें अपना “सहारा” बताया। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब उन्हें अपने पति की याद न आती हो।
उन्होंने कहा कि आज उन्हें अपने पति की बहुत कमी महसूस हो रही है और वह चाहती थीं कि इस अवसर पर वह उनके साथ होते। उन्हें विश्वास था कि उन्हें बेंच पर बैठे देखकर उनके पति को बहुत खुशी और गर्व होता। उन्होंने कहा कि पति की मृत्यु से पैदा हुआ बड़ा खालीपन आज भी कायम है, लेकिन जिंदगी लोगों के सामने चुनौतियां रखती है और व्यक्ति को आगे बढ़ने के लिए ताकत जुटानी पड़ती है।
जस्टिस सुधा ने केरल हाईकोर्ट में अपने कार्यकाल को भी याद किया। उन्होंने कहा कि वहां उन्हें कानून की विभिन्न शाखाओं से जुड़े मामलों पर काम करने का अवसर मिला और जज बनने के कुछ ही महीनों के भीतर फुल बेंच के फैसले लिखने का भी अवसर मिला।
दिल्ली हाईकोर्ट में अपने स्वागत को लेकर उन्होंने जजों का आभार जताया। उन्होंने कहा कि दूसरे हाईकोर्ट और दूसरे राज्य से आने के बावजूद दिल्ली हाईकोर्ट के जजों ने उन्हें कभी बाहरी होने का अहसास नहीं कराया।
उन्होंने दिल्ली बार और हाईकोर्ट के कर्मचारियों का भी धन्यवाद किया, जिनमें उनके प्राइवेट सेक्रेटरी, कोर्ट मास्टर, पर्सनल असिस्टेंट, ड्राइवर, पीएसओ, रजिस्ट्रार और लॉ रिसर्चर शामिल रहे।
जस्टिस सुधा ने उस समय के सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम का भी आभार जताया, जिसकी अध्यक्षता तत्कालीन चीफ जस्टिस बीआर गवई कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम ने उनके अनुरोध पर विचार करते हुए उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट में सेवा करने का अवसर दिया।
अपने संबोधन के अंतिम हिस्से में जस्टिस सुधा एक बार फिर भावुक हुईं और उन्होंने अपने बेटे का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उनके पति का निधन उस समय हुआ था, जब उनका बेटा कॉलेज में पढ़ रहा था। उन्होंने कहा कि पति की मृत्यु के बाद उनका बेटा रातोंरात बड़ा हो गया और तब से लगातार उनके साथ खड़ा रहा।
उन्होंने कहा कि कई बार उनका बेटा उन्हें संभालता रहा, हालांकि कुछ दिनों में तमाम मजबूती और साहस दिखाने के बावजूद वह खुद कमजोर पड़ जाती थीं।
दिल्ली हाईकोर्ट से विदाई लेते हुए जस्टिस सुधा ने कहा कि अदालत ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया, उन पर भरोसा किया और उन्हें योगदान देने का हर अवसर दिया। उन्होंने कहा कि इस दौरान उन्हें कभी यह महसूस नहीं कराया गया कि वह इस संस्थान के लिए बाहरी हैं।
सेवानिवृत्ति के बाद क्या यह उनके सार्वजनिक जीवन में “हमेशा के लिए पर्दा गिरने” का समय है, इस सवाल पर जस्टिस सुधा ने रॉबर्ट फ्रॉस्ट की प्रसिद्ध कविता की पंक्तियों के जरिए अपने संबोधन का समापन किया—“जंगल सुंदर, अंधेरे और गहरे हैं, लेकिन मुझे निभाने के लिए वादे हैं और सोने से पहले मुझे कई मील चलना है।”