इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह पूर्व उत्तर प्रदेश मंत्री और सांसद मोहम्मद आजम खान और अन्य से जुड़े 2016 जबरन बेदखली मामले के समेकित मुकदमे में अंतिम आदेश पारित करने पर 3 जुलाई तक रोक लगा दी।

जस्टिस दिनेश पाठक की पीठ ने मामले में खान के सह-आरोपी द्वारा दायर याचिका पर विचार करते हुए यह आदेश पारित किया, जिन्होंने दावा किया था कि निचली अदालत जून में ही मुकदमे को समाप्त करने के लिए 'अड़ियल' थी।

मामले को 3 जुलाई के लिए स्थगित करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि मामले में मुकदमा जारी रह सकता है। हालाँकि, तब तक कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया जाएगा।

यह मामला 15 अक्टूबर, 2016 की एक कथित घटना से संबंधित है, जिसमें रामपुर में स्थित यतीम खाना, वक्फ संख्या 157 नामक वक्फ संपत्ति पर अनधिकृत संरचनाओं को ध्वस्त करना शामिल है।

पिछले साल अगस्त में रामपुर के स्पेशल जज (एमपी/एमएलए) ने 2019 और 2020 के बीच दर्ज कुल 12 FIR को एक ही मुकदमे में शामिल कर दिया था। आरोपों में भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत डकैती, घर में जबरन घुसना और आपराधिक साजिश शामिल है।

जस्टिस समित गोपाल की एक अलग पीठ ने बुधवार को हुए घटनाक्रम के तहत निर्देश दिया कि खान और उनके सहयोगी वीरेंद्र गोयल द्वारा उसी मामले के संबंध में दायर की गई नई याचिका को सह-आरोपी द्वारा दायर की गई पिछली याचिका (जिसमें अंतिम आदेश पर रोक पहले ही दी जा चुकी थी) के साथ जोड़ा जाए।

खान और गोयल का प्रतिनिधित्व सीनियर एडवोकेट एनआई जाफरी ने किया। एडवोकेट शाश्वत आनंद और शशांक तिवारी ने पूरे मुकदमे पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की।

हालांकि, समेकित मुकदमे में अंतिम निर्णय पारित करने पर मौजूदा रोक को देखते हुए न्यायालय ने कोई नया अंतरिम निर्देश पारित करने से इनकार कर दिया और आदेश दिया कि उनकी याचिका को 3 जुलाई को सुनवाई के लिए सह-अभियुक्त की याचिका के साथ जोड़ दिया जाए।

संक्षेप में मामला

अपनी याचिका में खान और गोयल ने ट्रायल कोर्ट के 30 मई, 2025 के आदेशों को चुनौती दी है, जिसमें 12 FIR (अब एक ही मुकदमे में शामिल) में शिकायतकर्ताओं और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष जफर अहमद फारूकी सहित प्रमुख अभियोजन पक्ष के गवाहों को वापस बुलाने और रामपुर में यतीम खाना, वक्फ नंबर 157 में कथित 15 अक्टूबर, 2016 को बेदखली के दोषमुक्त करने वाले वीडियोग्राफिक साक्ष्य पेश करने के उनके अनुरोधों को अस्वीकार कर दिया गया था।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि फारूकी द्वारा स्वीकार किए गए इस फुटेज से घटनास्थल से उनकी अनुपस्थिति साबित हो सकती है, जो समेकित मुकदमे (विशेष मामला संख्या 45/2020) में अभियोजन पक्ष के दावों को खारिज कर देता है।

उनकी याचिका में पूरा मुकदमा रद्द करने की भी मांग की गई, जिसमें दावा किया गया कि यह अनुच्छेद 14, 19, 20 और 21 के तहत उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है तथा कार्यवाही को दुर्भावनापूर्ण बताया गया।

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