दिल्ली हिंसा : गिरफ़्तार हुए लोगों से मिलने की कोशिश करने वाले वकीलों से पुलिस ने की मारपीट

Update: 2020-02-27 06:30 GMT

दिल्ली की हिंसा को नहीं रोक पाने और निष्क्रियता की भारी आलोचना के बीच, ऐसी ख़बर है कि दिल्ली पुलिस ने एक थाने में उन वकीलों से मारपीट की जो गिरफ़्तार किए गए लोगों से मिलने गए थे।

उत्तरी दिल्ली के खुरेजी में में नागरिकता संशोधन अधिनियम के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों को गिरफ़्तार कर जगतपुरी पुलिस थाने ले जाया गया। वकीलों के एक समूह को इसका पता चला और वे सीआरपीसी की धारा 41D के तहत एक आवेदन के साथ इस थाने पर पहुंचे ताकि वे उन लोगों से मिल सकें जिनको गिरफ़्तार किया गया है। वहां मौजूद पुलिस अधिकारियों ने गिरफ़्तार हुए लोगों से मिलने के उनके आग्रह को यह कहते हुए नहीं माना कि एसएचओ थाने में नहीं हैं।

बाद में गिरफ़्तार हुए लोगों से मिलने के वकीलों के लगातार आग्रह के बाद कुछ पुलिस वाले वकीलों के वीडियो बनाने लगे। वकीलों ने इस पर आपत्ति की जिस पर पुलिस वाले उनसे धक्का मुक्की करने लगे और उन्हें ज़बरदस्ती थाने से भगाने के लिए बल प्रयोग किया। एक पुलिस वाले ने एक महिला वक़ील को धक्का दिया जबकि अन्य ने दो महिला वकीलों के फ़ोन छीन लिए। कुछ वकीलों पर पुलिसवालों ने हमले किया और उन्हें गालियां दी और उन पर लाठियां बरसायीं।

लाइव लॉ से बातचीत में एक महिला वक़ील अवनि बंसल ने बताया, "हमने वहां एक घंटे तक इंतज़ार किया और बाद में बताया गया कि एसएचओ नहीं है। इसके बाद हमने दोबारा गिरफ़्तार हुए लोगों से मिलने का आग्रह किया। इसके बाद हमें कहा गया कि थाने में किसी को नहीं रखा गया है। इसके बाद हमने उन्हें कहा कि वे हमें आवेदन स्वीकार करने की लिखित पावती दे दें।

इसी समय कुछ पुलिसवाले हमारा वीडिओ बनाने लगे और हमने इसका विरोध किया। इसके बाद एक पुलिसवाले ने एक महिला सामाजिक कार्यकर्ता को धक्का दे दिया। लगभग 20-25 पुलिसवाले इसके बाद हमें घेरकर लाठियों से मारना शुरू कर दिया और हमें वहां से धक्का देकर भगाने लगे"।

पुलिसवाले वकीलों को गालियां दे रहे थे और इन्हें धमका रहे थे और कह रहे थे कि वकीलों के भेष में वे दंगाई हैं जो पुलिस थाने में दंगा फैलाने के लिए आए हैं।

सूत्रों से पता चला है कि सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) को इस घटना की जानकारी दे दी गई है जिसने इसके बारे में पुलिस आयुक्त को लिखा है।

इस समय वक़ील इस घटना के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई के विकल्प पर विचार कर रहे हैं और वे इस बारे में अदालत में याचिका दायर कर सकते हैं।

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