'ऊंची-नीची जाति' की सोच और शादी के रिश्ते से जोड़ना अपमान की मंशा का प्रथमदृष्टया संकेत: कोर्ट का अजीत भारती को अग्रिम जमानत देने से इनकार
यूट्यूबर और सोशल मीडिया टिप्पणीकार अजीत भारती को दिल्ली कोर्ट से अग्रिम जमानत नहीं मिली है। अदालत ने कहा कि अनुसूचित जाति समुदाय से जुड़े एक मौजूदा सांसद की जाति और विवाह को लेकर भारती की कथित टिप्पणियां प्रथमदृष्टया अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) की धारा 3(1)(r) के तहत अपराध का संकेत देती हैं।
पटियाला हाउस कोर्ट के एडिशनल सेशन जज सौरभ प्रताप सिंह ललर ने एससी/एसटी अधिनियम के मामले में भारती की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
मामला भारती के नाम से चलने वाले कार्यक्रम के एक प्रकरण से जुड़ा है, जिसे 22 अगस्त को उनके सत्यापित सोशल मीडिया खाते और यूट्यूब पर डाला गया। आरोप है कि इसमें अनुसूचित जाति समुदाय, नगीना से मौजूदा सांसद चंद्रशेखर आजाद और डॉ. बी.आर. आंबेडकर के खिलाफ जातिसूचक, अपमानजनक और बेइज्जत करने वाली टिप्पणियां की गईं।
अदालत के मुताबिक, विवादित टिप्पणी सोशल मीडिया पर की गई एक टिप्पणी के जवाब में सामने आई, जिसमें भारती की बहन और सांसद चंद्रशेखर आजाद के कथित विवाह संबंध का जिक्र था।
अग्रिम जमानत से इनकार करते हुए अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से प्रथमदृष्टया यह सामने आता है कि भारती ने सांसद की विवाह-योग्यता पर बात करते हुए बार-बार जाति का उल्लेख किया। अदालत ने उस कथित टिप्पणी का भी संज्ञान लिया जिसमें कहा गया कि केवल “चमार और सांसद” होना विवाह के लिए पर्याप्त नहीं है और सांसद को पहले सवर्ण परिवार की लड़की से विवाह करने के योग्य खुद को साबित करना होगा।
अदालत ने कहा कि प्रथमदृष्टया इसे केवल सामान्य गाली या जाति का महज एक संदर्भ नहीं माना जा सकता। जज ने कहा कि इस भाषा में जातिगत ऊंच-नीच की व्यवस्था और विवाह संबंधी योग्यता को सीधे जोड़ा गया।
अदालत ने कहा,
“यह भाषा जातिगत पदानुक्रम और विवाह-योग्यता को सीधे जोड़ती है तथा 'ऊंची' जातियों को 'नीची' जातियों से श्रेष्ठ मानने वाली सोच को सामने लाती है।”
अदालत ने आगे कहा कि किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति को सवर्ण लड़की से विवाह के योग्य बनने के लिए कुछ अतिरिक्त या विशेष योग्यता हासिल करने की बात करना अपने आप में जाति से जुड़ा और अपमानजनक संदर्भ है।
हालांकि, अदालत ने साफ किया कि उसने कथित बयान की सच्चाई, उसकी शुद्धता या उस वक्त उसके पूरे संदर्भ पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया। अदालत ने कहा कि भारती इन पहलुओं को जांच अधिकारी और सुनवाई अदालत के समक्ष रखने के लिए स्वतंत्र हैं।
अदालत ने प्रथमदृष्टया माना कि SC/ST Act की धारा 3(1)(r) के आवश्यक तत्व सामने आते हैं। इसी आधार पर अधिनियम की धारा 18 में मौजूद अग्रिम जमानत पर रोक लागू होती है।
सोशल मीडिया पर वीडियो के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने और उसे 23 हजार से अधिक बार देखे जाने का भी अदालत ने संज्ञान लिया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि अपराध के लिए जरूरी “सार्वजनिक दृष्टि” का तत्व स्पष्ट रूप से अनुपस्थित है। इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय सुनवाई के दौरान किया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर SC/ST Act की धारा 3(1)(r) के तहत अपराध प्रथमदृष्टया बनता है, इसलिए धारा 18 के कारण अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती। इसके साथ ही भारती की याचिका खारिज कर दी गई।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि परिस्थितियों में बदलाव होने पर भारती दोबारा राहत मांग सकते हैं या कानून में उपलब्ध कोई अन्य उपाय अपना सकते हैं।
भारती सार्वजनिक रूप से अपने ऊपर लगे आरोपों का बचाव कर चुके हैं। उनका कहना है कि उन्होंने वीडियो में कोई जातिसूचक टिप्पणी नहीं की थी और वह अपनी मां तथा बहन के खिलाफ की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों का जवाब दे रहे थे।
मामले में SC/ST Act के साथ भारतीय न्याय संहिता की धारा 196(1)(c) और 351(3) तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धाराओं के तहत भी आरोप दर्ज किए गए।