नाना-नानी के साथ रहने वाली बेटी को भरण-पोषण देने की जिम्मेदारी से पिता बच नहीं सकता : दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2022-04-21 09:35 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि एक पिता अपनी पत्नी और बेटी को भरण-पोषण देने की अपनी जिम्मेदारी से इनकार नहीं कर सकता, भले ही उसे अपने माता-पिता की देखभाल करनी पड़ रही हो। इस प्रकार हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है,जिसमें उसे पत्नी और बेटी को भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

जस्टिस मुक्ता गुप्ता और जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि बेटी अपने नाना-नानी के साथ रह रही है, यह नहीं कहा जा सकता है कि पिता अपने बच्चे के प्रति अपनी जिम्मेदारी से मुक्त है।

कोर्ट पति की तरफ से दायर एक याचिका पर विचार कर रहा था, जिसमें 21 फरवरी, 2022 को फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी गई है। फैमिली कोर्ट ने पति को निर्देश दिया था कि वह हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 के तहत अपनी पत्नी व बेटी को प्रतिमाह 20,000 रुपये भरण-पोषण के तौर पर प्रदान करे।

अपीलकर्ता पति और प्रतिवादी पत्नी की शादी 24 फरवरी, 2011 को हुई थी और उन्हें 5 फरवरी, 2015 को एक बेटी हुई। समय के साथ दोनों पक्षों के बीच संबंध बिगड़ते गए। हालांकि, मई 2016 में, अपीलकर्ता पति को पता चला कि पत्नी के अपने चचेरे भाई के साथ व्यभिचारी संबंध हैं।

इसके बाद पति 22 मई 2016 को अपना घर छोड़कर अपने भाई के साथ रहने लग गया था। इसके बाद, उसने क्रूरता और व्यभिचार के आधार पर तलाक की याचिका दायर की, जो फैमिली कोर्ट के समक्ष लंबित है।

दूसरी ओर, प्रतिवादी पत्नी ने घरेलू हिंसा से महिलओं का संरक्षण अधिनियम 2005 की धारा 12 के तहत शिकायत दर्ज कराई,जो महिला न्यायालय के समक्ष निर्णय के लिए लंबित है।

प्रतिवादी पत्नी ने तलाक के लिए दायर याचिका में अधिनियम की धारा 24 के तहत एक आवेदन दायर किया और अपने व अपनी बेटी के लिए 45000 रुपये प्रतिमाह भरण पोषण की मांग की। फैमिली कोर्ट ने अपीलकर्ता की आय का 1,09,000 रुपये प्रति माह का आकलन किया और प्रतिवादी व उसकी बेटी को प्रतिमाह 20,000 रुपये भरण-पोषण के तौर पर प्रदान करने का निर्देश दिया।

अपीलकर्ता पति का मामला यह है कि उसकी नौकरी छूट चुकी है और वर्तमान में एक स्वतंत्र सेल्स प्रोफेशनल के रूप में काम कर रहा है और लगभग 40,000 रुपये प्रति माह कमा रहा है।

कोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता के तहत भरण-पोषण प्रदान करने का कारण अभाव और खानाबदोशी को दूर करना है जो कई बार एक व्यक्ति को अपराध करने के लिए बेताब करता है।

कोर्ट ने कहा कि,

''अनिवार्य रूप से इसका उद्देश्य अपराध के कमीशन के खिलाफ एक निवारक उपाय के रूप में जीवित रहने के लिए बुनियादी निर्वाह प्रदान करना है। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत दिया जाने वाला भरण-पोषण घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को तत्काल सहायता प्रदान करना है।''

यह भी कहा गया कि हिन्दू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत, पक्षकार मुकदमे में साक्ष्य पेश करने के बाद अपनी स्थिति के अनुसार भरण-पोषण के अपने दावे स्थापित कर सकते हैं।

कोर्ट ने कहा कि,

''हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 का उद्देश्य पति-पत्नी की आय की बराबरी करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि जब वैवाहिक कार्यवाही दायर की जाए, तो किसी भी पक्ष को आय के स्रोत की कमी के कारण नुकसान नहीं होना चाहिए और मुकदमेबाजी के खर्चों को पूरा करने और जीवनसाथी की दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए भरण-पोषण प्रदान किया जाता है।''

अपीलकर्ता की तरफ से यह भी दावा किया गया कि उसका मासिक खर्च 52,000 रुपये प्रतिमाह है और अपने वृद्ध माता-पिता और उनके चिकित्सा बिलों की जिम्मेदारी भी उसी पर है। इस दलील के संबंध में प्रतिवादी पत्नी द्वारा इंगित किया गया कि अपीलकर्ता के पिता को पेंशन मिलती है और माता-पिता के सभी चिकित्सा बिलों की प्रतिपूर्ति उसके पूर्व नियोक्ता द्वारा की जा रही है।

अदालत ने कहा, ''इसके अलावा, अगर यह स्वीकार कर लिया जाता है कि अपीलकर्ता को माता-पिता की देखभाल करनी है तो भी, वह अपनी पत्नी और बेटी को बनाए रखने की अपनी जिम्मेदारी से इनकार नहीं कर सकता है।''

आगे यह देखते हुए कि अपीलकर्ता पिता ने दावा किया है कि बेटी प्रतिवादी पत्नी के साथ नहीं रह रही है,बल्कि वह अपने नाना-नानी के साथ रह रही है,कोर्ट ने कहा,

'' अगर बेटी नाना-नानी के साथ रह रही है, तो भी यह नहीं कहा जा सकता है कि प्रतिवादी अपने बच्चे के प्रति अपनी जिम्मेदारी से मुक्त है।''

कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी पत्नी कमाने योग्य है और फ्रीलांस काम से 10,000 से 12000 रुपये प्रतिमाह कमा रही है, हालांकि उक्त कमाई को प्रतिवादी और उसकी बेटी के दिन-प्रतिदिन के खर्च और मुकदमेबाजी के खर्च को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता है।

कोर्ट ने कहा,''यह ऐसा मामला नहीं है जहां प्रतिवादी जिसने एमएससी की है और वह आलस्य या द्वेष के कारण बेकार बैठी है। वह अपने कौशल का उपयोग कर रही है और फ्रीलांस काम के जरिए लगभग 10,000 से 12,000 रुपये प्रतिमाह कमा रही है। हालांकि, इस कमाई को उसके लिए नियमित खर्च और मुकदमेबाजी के अन्य आकस्मिक खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता है।''

अदालत ने इस प्रकार निष्कर्ष निकाला कि फैमिली कोर्ट द्वारा प्रतिवादी पत्नी और बेटी, दोनों के लिए प्रदान की गई मासिक भरण-पोषण की राशि को अत्यधिक या गलत नहीं कहा जा सकता है।

तदनुसार याचिका खारिज कर दी गई।

केस का शीर्षक- एक्स बनाम वाई

साइटेशन- 2022 लाइव लॉ (दिल्ली) 345

आदेश पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें


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