"महिला स्वेच्छा से इस्लाम में परिवर्तित हुई": केरल हाईकोर्ट ने पत्नी और बेटे की अवैध कस्टडी और जबरन धर्मांतरण के आरोप में पति द्वारा दायर हेबियस कॉर्पस की याचिका खारिज की

Update: 2021-07-09 03:11 GMT

केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति ज़ियाद रहमान एए की खंडपीठ ने बुधवार को एक व्यक्ति की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसकी पत्नी और बेटे को जबरन इस्लाम में परिवर्तित किया गया और अवैध रूप से कस्टडी में रखा गया है। दरअसल, कोर्ट को पता चला कि महिला ने खुद की इच्छा से धर्म परिवर्तन किया है।

याचिकाकर्ता गिल्बर्ट पीटी (पूर्व माकपा कार्यकर्ता) ने 29 जून 2021 को एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की, जिसमें कोझीकोड के एक धार्मिक संस्थान, थेरबियाथुल इस्लाम सभा से अपनी पत्नी और बेटे को अवैध कस्टडी से रिहा करने की मांग की गई थी। यह भी प्रार्थना की गई कि उनकी कस्टडी याचिकाकर्ता को दी जाए, जो उनका कानूनी अभिभावक है।

मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता साजिथ कुमार ने पक्ष रखा।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी और बेटे को कुछ व्यक्तियों द्वारा उनकी इच्छा के विरुद्ध मजबूर किया गया और उक्त संस्थान में कस्टडी में रखा गया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि कुछ स्थानीय समिति के सदस्य पत्नी और बेटे को सभा में ले गए और कथित तौर पर उस महिला को, जो मूल रूप से एक ईसाई है, को 24 घंटों के भीतर इस्लाम में धर्मांतरण किया गया।

याचिकाकर्ता ने अपनी 'दूसरी पत्नी और बेटे' के कल्याण के लिए संबंधित अदालत का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया गया कि जबरन धर्मांतरण के लिए प्रतिवादियों द्वारा उसकी पत्नी और बेटे को जबरन ले जाया गया। यह भी आरोप लगाया कि पत्नी के माध्यम से याचिकाकर्ता को इस्लाम में परिवर्तित करने के लिए 25,00,000 रुपये की पेशकश की गई थी।

पत्नी-बेटे को कोर्ट में पेश किया गया। पुलिस निरीक्षक ने दोनों को पेश करते हुए अदालत को सूचित किया कि मां याचिकाकर्ता की पहली पत्नी की बहन है। अधिकारी के अनुसार वे एक साथ रह रहे थे, लेकिन कुछ दिनों में उनका झगड़ा हो गया था।

इसके बाद पत्नी अपने बेटे के साथ घर से बाहर छोड़कर चली गई। वे कुछ समय से अलग रह रहे हैं और वह वर्तमान में एक बेकरी में काम करती है। अदालत के संज्ञान में यह भी लाया गया कि महिला की याचिकाकर्ता से कानूनी रूप से शादी नहीं हुई थी।

अधिकारी ने बताया कि बेकरी का मालिक एक मुस्लिम है और महिला इस्लाम धर्म से प्रभावित हुई। कुछ ही समय बाद उसने इस्लाम धर्म अपना लिया और वर्तमान में प्रशिक्षण ले रही है।

अधिकारियों की अनुपस्थिति में न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति जियाद रहमान ए.ए ने महिला से बातचीत की। इस चर्चा के दौरान उसने स्वीकार किया कि उसने अपनी मर्जी से इस्लाम कबूल किया और किसी की ओर से कोई जबरदस्ती नहीं की गई।

बेंच ने कहा कि,

"पत्नी याचिकाकर्ता के साथ संबंध भी स्वीकार किया लेकिन आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता कुछ समय से पत्नी और बच्चे की देखभाल नहीं कर पा रहा था। वह यह भी स्वीकार करती है कि उसके और याचिकाकर्ता के बीच वैध विवाह नहीं  हुआ है। वह एक बेकरी में काम करती है और वह अब इस्लाम में परिवर्तित हो गई है और उसने जोर देकर कहा कि उसके बेटे का धर्मांतरण नहीं हुआ है।"

जब कोर्ट ने बच्चे से बातचीत की तो उसने वही बताया और अपनी मां के साथ रहने की इच्छा जताई। बच्चे ने यह भी पुष्टि की कि उसने अभी तक धर्म परिवर्तन नहीं किया है और यह तय नहीं किया है कि अब वह क्या तक चाहता है।

चूंकि याचिकाकर्ता से मिलने के बाद पत्नी और बेटे ने अपना रुख नहीं बदला, इसलिए कोर्ट ने पाया कि याचिका को लंबित रखने का कोई कारण नहीं है।

यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें अदालत के साथ साझा करने की कोई आशंका है, मां ने जवाब दिया कि बाहरी लोगों और यहां तक कि मीडिया के लगातार हस्तक्षेप के कारण बेटे की पढ़ाई बाधित हो रही है।

अदालत ने पाया कि अदालत द्वारा नोटिस जारी करने पर मीडिया में कई कॉलम लिखे गए, जिसमें कहा गया कि मां और बच्चा चरमपंथी निकायों की कस्टडी में हैं।

कोर्ट ने कहा कि,

"हम दुखी और निराश हैं क्योंकि इस तरह की जमीनी वास्तविकताओं की जांच किए बिना केवल समुदायों के ध्रुवीकरण का परिणाम घोषित कर देते हैं, जिसे नागरिक समाज बर्दाश्त नहीं कर सकता है। इसलिए हम पुलिस को निर्देश देते हैं कि यदि महिला द्वारा किसी भी तरह के उत्पीड़न की शिकायत की जाती है तो पुलिस यह सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कार्रवाई करेगी कि मां और बेटे को बिना किसी हस्तक्षेप और उत्पीड़न के अपना जीवन जीने दिया जाए।"

डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता इस आरोप को खारिज किया कि पत्नी और बेटा एक चरमपंथी निकाय की कस्टडी में थे। तद्नुसार रिट याचिका का निस्तारण किया गया।

केस का शीर्षक: गिल्बर्ट पीटी बनाम केरल राज्य और अन्य

आदेश  की कॉपी यहां पढ़ें:



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