अमित शाह पर 'आपत्तिजनक टिप्पणी' मामले में अभिषेक बनर्जी को राहत, हाईकोर्ट ने लगाई पुलिस कार्रवाई पर रोक
कलकत्ता हाईकोर्ट ने गुरुवार (21 मई) को अंतरिम आदेश में पुलिस को निर्देश दिया कि वह TMC नेता अभिषेक बनर्जी के खिलाफ 31 जुलाई तक कोई भी दंडात्मक कार्रवाई न करे। अभिषेक बनर्जी के खिलाफ एक FIR दर्ज की गई, जिसमें आरोप है कि उन्होंने एक चुनावी रैली के दौरान गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं।
दोनों पक्षकारों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस सौगत भट्टाचार्य ने अंतरिम आदेश सुनाते हुए कहा:
"दलीलों पर विचार करने और कथित अपराध की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए अदालत का मानना है कि याचिकाकर्ता से हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है। इसके अलावा, याचिकाकर्ता के अधिकार BNSS की धारा 35(3) के तहत सुरक्षित हैं। इस चरण पर अदालत पुलिस को निर्देश देती है कि वह याचिकाकर्ता के खिलाफ 31 जुलाई तक, या अगले आदेश तक—जो भी पहले हो—कोई भी दंडात्मक कदम न उठाए।"
अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को जांच एजेंसी के साथ जांच में सहयोग करना होगा और यदि याचिकाकर्ता को कोई नोटिस जारी किया जाता है तो उसे उसका पालन करना होगा। अदालत ने आगे कहा कि नोटिस जारी करते समय याचिकाकर्ता को कम से कम 48 घंटे का समय दिया जाएगा।
अदालत ने कहा,
"यदि याचिकाकर्ता जांच एजेंसी के साथ सहयोग नहीं करता है तो संबंधित राज्य प्रतिवादी उचित आवेदन के साथ अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए स्वतंत्र होगा। याचिकाकर्ता अदालत की अनुमति के बिना विदेश नहीं जाएगा।"
अदालत ने कहा कि यह अंतरिम आदेश 31 जुलाई तक प्रभावी रहेगा। इसलिए मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई को तय की।
याचिका के अनुसार, FIR एक शिकायत के आधार पर दर्ज की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि बनर्जी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के प्रचार के दौरान एक जनसभा को संबोधित करते हुए शाह के खिलाफ मानहानिकारक और भड़काऊ बयान दिए।
खबरों के अनुसार, बनर्जी के खिलाफ BNS की धारा 196 (दुश्मनी, नफरत को बढ़ावा देना), 351 (आपराधिक धमकी), और 353(1)(c) (नफरत भड़काने के लिए झूठी जानकारी, अफवाहें फैलाना), आदि के तहत मामला दर्ज किया गया है। BNS की धारा 196 एक गैर-जमानती अपराध है, जिसमें तीन साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है।
उनके खिलाफ 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' की धारा 123(2) और धारा 125 के तहत भी मामला दर्ज किया गया।
Case title: Abhishek Banerjee v/s State