ECI कब उपचुनाव न कराने का फ़ैसला ले सकता है? सुप्रीम कोर्ट करेगा RP Act की धारा 151A की व्याख्या
सुप्रीम कोर्ट 'रिप्रेज़ेंटेशन ऑफ़ पीपुल एक्ट' (जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम) (RP Act) की धारा 151A की व्याख्या से जुड़े मुद्दों पर विचार करने जा रहा है। इस धारा में प्रावधान है कि लोकसभा, राज्यसभा या राज्य विधानसभाओं/परिषदों में खाली हुई सीट को भरने के लिए 6 महीने के भीतर उपचुनाव कराए जाएं।
उल्लेखनीय है कि धारा 151A में एक शर्त (प्रोविज़ो) भी है, जिसके अनुसार अगर खाली सीट के लिए कार्यकाल का बचा हुआ समय 1 साल से कम है, तो ECI को उपचुनाव कराने की ज़रूरत नहीं है। इसलिए इस मामले में उठने वाले मुद्दों में से एक यह है कि 1 साल की अवधि की गिनती किस तारीख से की जाएगी: जिस तारीख को पद खाली हुआ, 6 महीने की अवधि खत्म होने के बाद की तारीख, या कोई और तारीख?
4 अगस्त को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ ECI की चुनौती पर सुनवाई की, जिसमें कहा गया था कि 1 साल की अवधि की गिनती उस तारीख से की जानी चाहिए जब पद खाली हुआ था और ECI को 6 महीने की अवधि के भीतर चुनाव पूरे करने होंगे।
हाईकोर्ट ने यह आदेश दिसंबर 2023 में दिया था, जिसमें ECI को सांसद गिरीश बापट के निधन के बाद खाली हुई पुणे लोकसभा सीट के लिए उपचुनाव कराने का निर्देश दिया गया। हालांकि, जनवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी और कहा कि धारा 151A लागू होती है।
सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह केवल कानूनी मुद्दे पर विचार करेगा।
ECI की ओर से सीनियर एडवोकेट दामा शेषद्रि नायडू ने कहा कि कोर्ट को इस प्रावधान (धारा 151A) की व्याख्या करने की ज़रूरत है।
उन्होंने कहा,
"हम भी इसके लिए तैयार हैं, क्योंकि इसमें कुछ अस्पष्टता है जिसे दूर करने की ज़रूरत है।"
सीनियर वकील ने आगे कहा कि एक्ट के तहत ECI के पास 6 महीने की अवधि के भीतर चुनाव कराने की छूट है और तैयारी के लिए कम से कम 2 महीने का समय भी तय किया गया। उन्होंने आगे तर्क दिया कि जिन मामलों में चुनाव से जुड़ी कोई याचिका लंबित है, वहां संबंधित हाई कोर्ट द्वारा मामले का निपटारा होने तक ECI को चुनाव कराने से रोका जा सकता है।
बेंच द्वारा ECI का रुख पूछे जाने पर नायडू ने कहा कि 1 साल की अवधि की गणना 6 महीने की अवधि को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर पद खाली होने के बाद लंबा अंतराल होता है, तो कोई समस्या नहीं है। हालांकि, जिन मामलों में 1 साल की अवधि खत्म होने के करीब हो, वहां कोर्ट को दिशानिर्देश तय करने पड़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि ECI चुनाव कराने से पीछे नहीं हट रहा है, लेकिन कानूनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।
बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के संबंध में नायडू ने बताया कि एक अन्य मामले (संदीप सरोदे बनाम ECI) में ECI ने चुनाव कराने का फैसला किया था, लेकिन हाईकोर्ट की एक अन्य बेंच ने अलग राय अपनाई और उस फैसले पर रोक लगा दी।
एक संबंधित मामले में पेश हुए सीनियर एडवोकेट डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि मतदाताओं का प्रतिनिधित्व का अधिकार धारा 151A के प्रावधान पर हावी होना चाहिए, जिसे विवादित फैसले में अनिवार्य माना गया था। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह प्रावधान अनिवार्य नहीं है।
सिंघवी ने आगे सवाल उठाया कि हाईकोर्ट चुनाव कराने के लिए ECI द्वारा 6 महीने के भीतर लिए गए फैसले पर कैसे रोक लगा सकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अगर ECI 6 महीने की अवधि के आखिरी हफ्ते में चुनाव की घोषणा करता है, और हाईकोर्ट इस फैसले पर रोक लगा देता है, क्योंकि 1 साल की अवधि खत्म होने के करीब है तो मतदाता 18 महीने तक प्रतिनिधित्व से वंचित रह जाएंगे। यह भी दावा किया गया कि 4 हाईकोर्ट ने इसी तरह की राय अपनाई है और केवल संदीप मामले (जो अलग तरह का मामला है) में अलग राय अपनाई गई।
पुणे मामले में प्रतिवादी की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट रितिन राय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि यह प्रावधान ECI को व्यापक शक्तियां देता है। उन्होंने आरोप लगाया कि उपचुनाव कराने के मामले में ECI अपनी पसंद के अनुसार फैसले ले रहा है। मध्य प्रदेश, गुजरात और बिहार में हाल ही में हुए उपचुनावों के नतीजों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ECI ने असम (एक), पश्चिम बंगाल (दो) और कर्नाटक (एक) में खाली हुई सीटों के लिए उपचुनाव नहीं कराए।
राय ने इस बात पर ध्यान दिलाया कि एक समस्या यह है कि ECI अलग-अलग उपचुनावों के लिए नियमों की अलग-अलग तरह से व्याख्या कर रहा है। तथ्यों के आधार पर सीनियर वकील ने बताया कि पुणे निर्वाचन क्षेत्र की लोकसभा सीट मार्च 2023 में खाली हो गई, लेकिन 11 अगस्त 2023 तक ECI ने गवर्नर को लिखा कि उपचुनाव नहीं कराए जा सकते। इसके अलावा, उसी दिन केंद्र सरकार ने भी इस बात को मान लिया।
यानी, भले ही अगले आम चुनाव में 1 साल से ज़्यादा का समय बचा था, फिर भी ECI ने अगस्त 2023 तक इंतज़ार किया और आखिर में प्रशासनिक कारणों से चुनाव कराने से इनकार कर दिया (यह कहते हुए कि आम चुनाव में 1 साल से कम समय बचा था)। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि यह फ़ैसला लेने से पहले न तो कोई असरदार बातचीत हुई और न ही जनता को कोई जानकारी दी गई।
Case Title: ELECTION COMMISSION OF INDIA Versus SUGHOSH JOSHI AND ANR., SLP(C) No. 200/2024