'अगर भौंकने से काम न चले तो वॉचडॉग को काटना ही होगा': संविधान के संरक्षक के तौर पर सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर जस्टिस कुरियन जोसेफ
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस कुरियन जोसेफ ने ज़ोर देकर कहा कि संवैधानिक अदालतों, खासकर सुप्रीम कोर्ट को संविधान के 'वॉचडॉग' (निगरानी रखने वाले) के तौर पर काम करना चाहिए और जब संवैधानिक सोच या मूल्यों पर खतरा हो, तो दखल देना चाहिए।
जस्टिस जोसेफ ने कहा,
"भौंकने वाला कुत्ता शायद ही कभी काटता है। लेकिन यह भौंकने वाला कुत्ता - यानी संरक्षक, वॉचडॉग या रखवाला - अगर भौंकने से मनचाहा नतीजा न मिले, तो काटने के लिए भी मजबूर हो जाता है।"
जस्टिस जोसेफ, इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ लॉयर्स, केरलम द्वारा आयोजित "भारत के चुनाव आयोग की आज़ादी: क्या समझौता किया गया?" विषय पर एक सेमिनार में उद्घाटन भाषण दे रहे थे।
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि संवैधानिक अदालतें, खासकर सुप्रीम कोर्ट, संविधान की संरक्षक और वॉचडॉग हैं। उन्होंने समझाया कि वॉचडॉग तब भौंकता है, जब उसकी देखरेख में रखी किसी चीज़ पर खतरा होता है, ताकि मालिक - इस मामले में 'हम भारत के लोग' - को खतरे के बारे में आगाह किया जा सके।
हालांकि, उन्होंने कहा कि लोगों की यह धारणा है कि जब संवैधानिक संस्थाओं की आज़ादी और अखंडता पर खतरा मंडराता है तो वे न तो भौंकती हैं और न ही काटती हैं। उन्होंने कहा कि इससे यह सवाल उठता है कि क्या संविधान की रक्षा की ज़िम्मेदारी वाली संस्थाएं आज़ादी और अखंडता की संवैधानिक सोच पर खरी उतरती हैं।
उन्होंने कहा,
"हमने वह मशहूर कहावत सुनी है कि भौंकने वाला कुत्ता शायद ही कभी काटता है। लेकिन यह भौंकने वाला कुत्ता - यानी संरक्षक, वॉचडॉग या रखवाला - अगर भौंकने से मनचाहा नतीजा न मिले, तो काटने के लिए भी मजबूर हो जाता है। लेकिन ऐसी बड़ी संवैधानिक संस्थाओं के बारे में यह धारणा है कि वे न तो भौंकती हैं और न ही काटती हैं; हालात ऐसे हैं कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए बड़ी शक्तियां रखने वाली इन संस्थाओं की आज़ादी और अखंडता के मामले में संविधान की सोच का सम्मान करने के बजाय उसका उल्लंघन ज़्यादा होता है। आम आदमी की यही सोच है।"
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह पक्का करने के लिए कि संवैधानिक अधिकारी जवाबदेह बने रहें और अपनी ज़िम्मेदारियों के मुताबिक अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करें, जनता की सतर्कता ज़रूरी है।
जनता की सतर्कता और वकीलों की भूमिका पर जस्टिस जोसेफ
जस्टिस जोसेफ ने ज़ोर देकर कहा कि लोकतंत्र के लिए जनता की सतर्कता एक ज़रूरी सुरक्षा उपाय है। डॉ. राम मनोहर लोहिया की इस बात का ज़िक्र करते हुए कि जब संसद और अदालतें नाकाम हो जाती हैं तो सड़कें ही बचाव के लिए आगे आती हैं, उन्होंने कहा कि नागरिकों का यह फ़र्ज़ है कि वे गलत होने पर आवाज़ उठाएं और समझदारी व शालीनता के साथ विरोध करें।
उन्होंने लोकतंत्र और संवैधानिक शासन पर असर डालने वाले मुद्दों पर वकीलों की आवाज़ उठाने की ज़िम्मेदारी पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें खुशी है कि वकीलों ने अपने पेशेवर दायरे से जुड़े मामलों पर चर्चा करने और जनता को जागरूक करने का फ़ैसला किया।
उन्होंने कहा,
"मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि कानून जानने वालों की चुप्पी, कानून तोड़ने वालों की हिंसा से ज़्यादा हिंसा और समाज में ज़्यादा समस्याएं पैदा करेगी।"
उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि जब भी लोकतंत्र खतरे में पड़ा है, वकील संविधान की रक्षा के लिए आगे आए हैं, चाहे उनकी राजनीतिक विचारधारा, सांप्रदायिक जुड़ाव या अन्य मतभेद कुछ भी रहे हों। हालांकि, उन्होंने चिंता जताई कि आज वकीलों का समुदाय बंटा हुआ नज़र आता है।
उन्होंने इस बात की आलोचना की कि जब वकील समुदाय के सदस्य कोई चिंता जताते हैं तो उनकी बात के मुख्य मुद्दे पर ध्यान देने के बजाय बोलने वाले की पहचान और बैकग्राउंड पर सवाल उठाए जाते हैं।
इस रवैये पर सवाल उठाते हुए जस्टिस जोसेफ़ ने पूछा कि क्या संवैधानिक सिद्धांत इस बात पर निर्भर करते हैं कि उन्हें कौन कह रहा है। उन्होंने कहा कि सही तरीका यह होना चाहिए कि तर्क में क्या कमी है, इसकी जांच की जाए, न कि तर्क देने वाले व्यक्ति को निशाना बनाया जाए।
उन्होंने कहा,
“अगर कोई कानून का जानकार कुछ गलत कहता है तो लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते कि उसने क्या गलत कहा है, बल्कि वे उस व्यक्ति के बारे में बातें करने लगते हैं या उसकी कुंडली खंगालने लगते हैं कि किसने यह बात कही। इसका क्या मतलब है? क्या संवैधानिक सोच इस बात पर निर्भर करती है कि बात किसने कही है? या फिर, अगर कुछ गलत होता है, तो क्या हमें इस बात पर विचार नहीं करना चाहिए कि गलती क्या है, बजाय इसके कि हम उन लोगों के पीछे पड़ जाएं जिन्होंने वह गलत बात कही है?”
उन्होंने कहा कि जिन लोगों पर संविधान की रक्षा की ज़िम्मेदारी है, उन्हें संवैधानिक सवालों पर अपनी निजी राय (Subjective Approach) रखने के बजाय “संवैधानिक रूप से निष्पक्ष” (Constitutionally Objective) रहना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि लोगों की नज़र में संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और ईमानदारी बुरी तरह डगमगा गई है, इसलिए नागरिकों के लिए ज़रूरी हो गया है कि वे जानकारी के साथ और सभ्य तरीके से अपनी बात रखें।
उन्होंने कहा,
“आजकल ऐसा लगता है कि लोग संवैधानिक मामलों में निष्पक्ष होने के बजाय अपनी निजी राय को ज़्यादा अहमियत देते हैं। सही बात तो यह है कि भारत के संविधान के रक्षकों या संरक्षकों से यह उम्मीद की जाती है कि वे संवैधानिक मामलों में निष्पक्ष रहें। लेकिन संस्थाओं की विश्वसनीयता को लेकर लोगों की धारणा बहुत बुरी तरह प्रभावित हुई है। यही वजह है कि हम सड़कों पर लोगों को देख रहे हैं; जैसा कि डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा था, अब लोकतंत्र को बचाने के लिए आम लोग सड़कों पर उतर रहे हैं... यह नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों में से एक है कि जब हालात बिगड़ें, तो वे जानकारी के साथ और सभ्य तरीके से विरोध दर्ज कराएं और लोकतंत्र की रक्षा के लिए कदम उठाएं।”