JNU के पूर्व छात्र उमर खालिद ने 2020 के दिल्ली दंगों की 'बड़ी साजिश' (Larger Conspiracy) से जुड़े मामले में जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया था। उन्होंने अपनी याचिका में कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत देने पर लगाई गई एक साल की रोक जल्द ही खत्म होने वाली है।
उन्होंने यह भी कहा कि कोर्ट द्वारा रखी गई एक और शर्त—अभियोजन पक्ष (Prosecution) द्वारा संरक्षित गवाहों (Protected Witnesses) से पूछताछ—5 जनवरी 2027 तक पूरी होना संभव नहीं है। इसलिए लंबे समय से जेल में बंद होने का हवाला देते हुए, उन्होंने जमानत की मांग की।
गौरतलब है कि 5 जनवरी 2026 को, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने इमाम और JNU के पूर्व छात्र खालिद को जमानत देने से इनकार किया था। कोर्ट ने उन्हें इस 'बड़ी साजिश' का "वैचारिक संचालक" (Ideological Drivers) करार दिया था। हालांकि, इसी मामले में गुलफिशा फातिमा समेत पांच अन्य आरोपियों को जमानत दी गई थी, क्योंकि कोर्ट ने कथित साजिश में उनकी भूमिकाओं को अलग-अलग माना था।
जमानत खारिज करते समय कोर्ट ने जमानत देने पर एक साल की रोक लगाई थी। कोर्ट ने कहा कि इमाम और खालिद संरक्षित गवाहों से पूछताछ पूरी होने के बाद, या आदेश पारित होने के एक साल बाद—जो भी पहले हो—फिर से कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
30 सितंबर को दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच (जिसमें जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस दिनेश भट्ट शामिल थे) ने भी जमानत देने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कोई बदलाव नहीं कर सकती।
खालिद ने कहा कि चूंकि अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं और अभियोजन पक्ष गवाहों से पूछताछ करने में विफल रहा है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट की "जो भी पहले हो" वाली शर्त के 5 जनवरी, 2027 की समय-सीमा के भीतर पूरी होने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
आरोपी ने जस्टिस अरविंद कुमार के 22 मई के उस आदेश का भी हवाला दिया, जिसमें उन्होंने इस मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेजा था। ऐसा सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग बेंचों के बीच 'के.ए. नजीब' फैसले की व्याख्या को लेकर हुए "संभावित मतभेद" के कारण किया गया। 'के.ए. नजीब' मामले में कहा गया था कि लंबे समय तक जेल में रहने से UAPA के तहत जमानत के कड़े प्रावधानों की सख्ती कम हो सकती है।
यह मतभेद तब सामने आया, जब जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की दो-जजों वाली बेंच ने 'सैयद इफ्तिखार अंद्राबी' मामले में 'गुलफिशा फातिमा' फैसले की आलोचना की। उन्होंने कहा कि 'गुलफिशा फातिमा' मामले में UAPA के तहत जमानत को लेकर बहुत संकुचित दृष्टिकोण अपनाया गया, जिससे 'के.ए. नजीब' मामले के फैसले का असर कम हो गया।
जस्टिस नागरत्ना की बेंच द्वारा जताई गई आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए जस्टिस कुमार की बेंच ने इस मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया। साथ ही उन्होंने सह-आरोपियों तस्लीम अहमद और खालिद सैफी को छह महीने के लिए अंतरिम जमानत दी।
तस्लीम अहमद और खालिद सैफी को जमानत देते हुए कोर्ट ने कहा:
"हम इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि मौजूदा अपीलकर्ताओं ने काफी लंबा समय जेल में बिताया है; मुकदमे के जल्द खत्म होने की संभावना नहीं है; अपीलकर्ताओं ने खुद 'गुलफिशा फातिमा' मामले में तय किए गए 'कैलिब्रेटेड संवैधानिक विवेक' (Calibrated Constitutional Discretion) के सिद्धांत का हवाला दिया; और इन मुद्दों के समाधान में अभी और समय लग सकता है। केवल इसलिए कि कानून का एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आया है जिसे सुलझाया जाना बाकी है, अपीलकर्ताओं को लगातार जेल में रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। मामले के गुण-दोष पर कोई राय दिए बिना और कड़ी शर्तों के साथ, हम अपीलकर्ताओं को अगले आदेश तक अंतरिम जमानत देने के पक्ष में हैं।"
लंबे समय तक जेल में रहने और निकट भविष्य में मुकदमा पूरा न हो पाने की इन बातों का हवाला देते हुए खालिद ने तर्क दिया है कि यह मामला 'त्वरित सुनवाई' (Speedy Trial) के अधिकार के उल्लंघन का एक उपयुक्त उदाहरण है।
2020 की FIR 59 की जांच दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल कर रही है। मामला भारतीय दंड संहिता, 1860 और (IPC) गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) के तहत विभिन्न अपराधों के तहत दर्ज किया गया।
मामले में आरोपी हैं ताहिर हुसैन, उमर खालिद, खालिद सैफी, इशरत जहां, मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा, शिफा-उर-रहमान, आसिफ इकबाल तन्हा, शादाब अहमद, तस्लीम अहमद, सलीम मलिक, मोहम्मद। सलीम खान, अतहर खान, सफूरा जरगर, शरजील इमाम, फैजान खान और नताशा नरवाल।