भूमि अधिग्रहण मुआवजे का फैसला अफसर नहीं, न्यायिक अनुभव रखने वाले करें: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा कानून में संशोधन

Update: 2026-07-23 12:52 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम में जल्द उपयुक्त संशोधन किया जाए, ताकि भूमि अधिग्रहण मुआवजे से जुड़े विवादों का फैसला सरकारी अधिकारियों के बजाय न्यायिक अनुभव रखने वाले व्यक्ति करें। अदालत ने कहा कि मुआवजे का निर्धारण पूरी तरह न्यायिक कार्य है और इसे नौकरशाहों के भरोसे छोड़ना प्रथमदृष्टया स्वीकार्य नहीं है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 की धारा 3जी और 3जे को असंवैधानिक घोषित किया गया।

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम में संशोधन पर गंभीरता से विचार कर रही है। उन्होंने कहा कि यदि संशोधन होता है तो लंबित मामलों का समाधान भी हो जाएगा।

इस पर चीफ जस्टिस ने कहा,

"हर भूमि अधिग्रहण कानून में मुआवजे का निर्धारण, जो पूरी तरह न्यायिक कार्य है, न्यायिक अनुभव रखने वाले लोगों द्वारा किया जाता है। केवल इसी कानून में अपवाद बनाकर यह जिम्मेदारी नौकरशाहों को सौंप दी गई। प्रथमदृष्टया यह हमें स्वीकार्य नहीं है। इस स्थिति का समाधान या तो संसद करेगी या फिर हमें करना पड़ेगा।"

अदालत ने कहा कि अन्य भूमि अधिग्रहण कानूनों के तहत मुआवजे से जुड़े विवादों का फैसला न्यायालय करते हैं, जहां साक्ष्यों के आधार पर बाजार मूल्य का निष्पक्ष निर्धारण होता है। जबकि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत ऐसे विवाद सरकारी अधिकारियों के समक्ष भेजे जाते हैं, जिन पर प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी होती हैं और जिनके पास ऐसे मामलों के न्यायिक निर्णय का अनुभव नहीं होता।

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने भी राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम और मध्यस्थता कानून के संबंध में कई कानूनी प्रश्न उठाए और कहा कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि यदि दोनों कानूनों के प्रावधानों में टकराव हो तो किसे प्राथमिकता मिलेगी।

सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अटॉर्नी जनरल से इस विषय को सक्षम प्राधिकारी के समक्ष उठाकर राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम में आवश्यक संशोधन कराने का आग्रह किया गया। अटॉर्नी जनरल ने भरोसा दिलाया कि इस पर जल्द कार्रवाई की जाएगी। तब तक लंबित मध्यस्थता की कार्यवाही जारी रहेगी, जो इस मामले के अंतिम फैसले के अधीन होगी।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने किसानों को मिलने वाले सांत्वना अनुदान और ब्याज का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि पहले किसानों के साथ यह अन्याय हुआ कि उन्हें सांत्वना अनुदान और ब्याज नहीं दिया गया, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट को अपने फैसले से ठीक करना पड़ा।

चीफ जस्टिस ने कहा कि राष्ट्रीय राजमार्ग बनने से सटी भूमि का बाजार मूल्य सामान्य भूमि की तुलना में अधिक होता है। इसके बावजूद यदि अन्य भूमि अधिग्रहण कानूनों के तहत अधिक संरक्षण मिलता है और राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत नहीं, तो यह असमानता दूर किया जाना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि अन्य कानूनों में जिला अधिकारी के निर्णय के बाद मामला न्यायिक मंच पर जाता है, जहां पक्षकार साक्ष्य पेश कर सकते हैं, जबकि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम में ऐसी व्यवस्था का अभाव है।

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