सुप्रीम कोर्ट भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार गौतम नवलखा द्वारा बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा जमानत देने से इनकार करने के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करेगा

Update: 2021-03-02 03:00 GMT

सुप्रीम कोर्ट भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार एक्टिविस्ट और पत्रकार गौतम नवलखा द्वारा बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा उन्हें बेल देने से इनकार करने के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर 3 मार्च से सुनवाई करेगा। सुप्रीम कोर्ट में गौतम नवलखा की याचिका पर जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस केएम जोसेफ की तीन जजों की बेंच बुधवार से सुनवाई करेगी। गौतम नवलखा एल्गर परिषद मामले में आरोपी है और बॉम्बे हाईकोर्ट ने उन्हें माओवादी लिंक केस में जमानत देने से इनकार कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष नवलखा की याचिका उस समय आई जब बॉम्बे हाईकोर्ट में जस्टिस एसएस शिंदे और एमएस कार्णिक की खंडपीठ नेे विशेष अदालत के एक आदेश के खिलाफ दायर उनकी आपराधिक अपील में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। वह 14 अप्रैल, 2020 को अपने आत्मसमर्पण के बाद से जेल में है।

नवलखा ने इस आधार पर डिफ़ॉल्ट जमानत मांगी कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) 90 दिनों की निर्धारित अवधि के भीतर अपनी चार्जशीट दाखिल करने में विफल रही। एनआईए ने हालांकि दावा किया कि 29 अगस्त से 1 अक्टूबर 2018 के बीच नवलखा को 34 दिनों तक नजरबंद रखा गया था, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने अवैध घोषित कर दिया था, इसलिए, यह समय उनकी हिरासत अवधि में शामिल नहीं किया जा सका।

हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 167 (2) के तहत डिफ़ॉल्ट जमानत देने के लिए निर्धारित 90 दिनों की अवधि की गिनती करते समय "गैरकानूनी हिरासत" में बिताया गया समय शामिल नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने आगे कहा कि 28 अगस्त, 2018 से 10 अक्टूबर, 2018 के बीच नवलखा घर में नज़रबंद रहे थे, इसलिए यह समय उनकी कुल हिरासत अवधि की गिनती करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। साथ ही मजिस्ट्रेट के ट्रांजिट रिमांड के दौरान के समय को भी दिल्ली हाईकोर्ट ने अवैध घोषित कर दिया था।

कोर्ट ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि नवलखा घर में नजरबंद थे और इस दौरान वह केवल अपने परिवार और वकीलों से बातचीत कर सकते थे। हालांकि, जांच एजेंसी के पास उनसे पूछताछ करने के लिए कोई अवसर नहीं था, क्योंकि हाईकोर्ट ने पुलिस को नवलखा को उसी स्थान पर रखने का आदेश दिया था, जहां से उन्हें गिरफ्तार किया गया था।

पीठ ने कहा,

"चूंकि ट्रांजिट रिमांड के आदेश पर रोक लगाई गई थी, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि अपीलकर्ता पुलिस जांच के लिए हिरासत में था।"

अदालत ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 167 (2) मानती है कि हिरासत मजिस्ट्रेट द्वारा अधिकृत है और उस दिन से 90 दिन की अवधि का उपयोग डिफ़ॉल्ट जमानत के लिए हिरासत की अवधि की गिनती के लिए किया जा सकता है।

कोर्ट ने आगे कहा,

"हालांकि, एक बार मजिस्ट्रेट द्वारा प्राधिकृत किए जाने के बाद अवैध रूप से हिरासत में रखने को अवैध घोषित कर दिया जाता है, उक्त अवधि (हाउस अरेस्ट कस्टडी) को सीआरपीसी की धारा 167 (2) के अर्थ के भीतर अधिकृत हिरासत में नहीं लिया जा सकता है।"

महाराष्ट्र पुलिस ने एक दिन बाद 31 दिसंबर, 2017 को आयोजित 'एल्गर परिषद' और भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद दर्ज प्राथमिकी के सिलसिले में 28 अगस्त, 2018 को नवलखा को गिरफ्तार किया था। सम्मेलन से जुड़े कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों पर देशव्यापी कार्रवाई करके पुलिस ने एक बड़ी माओवादी साजिश का पर्दाफाश करने का दावा किया था।

बाद में मामला एनआईए को सौंप दिया गया था। अगस्त, 2018 में नवलखा की गिरफ्तारी और उसके बाद घर पर नज़रबंदी को दिल्ली हाईकोर्ट ने अवैध घोषित कर दिया था। तब नवलखा ने सत्र न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन किया, मगर सुप्रीम कोर्ट ने नवलखा को 16 मार्च 2020 को उनकी जमानत अर्जी खारिज करने के बाद उन्हें तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था। कोरोनावायरस महामारी के मद्देनजर उनकी जमानत-विस्तार की याचिका को भी खारिज कर दिया गया था। इसके बाद नवलखा ने 14 अप्रैल को आत्मसमर्पण कर दिया था।

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