Bilkis Bano Case : सुप्रीम कोर्ट ने हत्या और गैंगरेप के लिए उम्रकैद की सज़ा पाए 2 दोषियों की अपील पर जारी किया नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने बिलकिस बानो केस के दो दोषियों - बिपिनचंद कनैलाल जोशी और प्रदीप रमनलाल मोधिया - की याचिका पर नोटिस जारी किया। यह याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट के 4 मई, 2017 के उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ थी, जिसमें हाई कोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि और सज़ा को सही ठहराया था।
जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने गुजरात और महाराष्ट्र राज्यों को नोटिस जारी किया और इस SLP (विशेष अनुमति याचिका) की सुनवाई के लिए 5 मई, 2026 की तारीख़ तय की।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने जोशी और मोधिया समेत 11 आरोपियों की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सज़ा को सही ठहराया था। यह सज़ा ट्रायल कोर्ट ने हत्या, दंगा और गैंगरेप से जुड़े अपराधों के लिए दी थी। ये अपराध IPC की धारा 143, 147, 302 (धारा 149 के साथ पढ़ी गई) और धारा 376(2)(e) और (g) के तहत आते हैं। हाईकोर्ट ने अन्य अपराधों के लिए भी कठोर कारावास की सज़ाओं को सही ठहराया, जिसमें IPC की धारा 376(2)(g) के तहत दस साल की जेल भी शामिल थी।
यह मामला उन सांप्रदायिक दंगों से जुड़ा है, जो 27 फरवरी, 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस को जलाए जाने के बाद गुजरात में भड़क उठे थे। 21 साल की बिलकिस बानो, जो उस समय 5 महीने की गर्भवती थीं, हिंसा और आगज़नी के डर से अपने परिवार के सदस्यों के साथ अपने गाँव - रांधिकपुर - से भाग गई थीं।
3 मार्च, 2002 को पन्नीवेल के पास सफ़र करते समय इस समूह पर एक भीड़ ने हमला कर दिया। बिलकिस ने आरोपियों की पहचान की - जिनमें मौजूदा याचिकाकर्ता भी शामिल थे - और बताया कि वे उस भीड़ का हिस्सा थे जिसने उनके समूह पर हमला किया, उनके कई रिश्तेदारों (जिनमें उनकी 3 साल की बेटी भी शामिल थी) की हत्या की और उनके साथ गैंगरेप किया।
स्थानीय पुलिस की शुरुआती जांच के बाद 'क्लोज़र रिपोर्ट' (मामला बंद करने की रिपोर्ट) दायर की गई। 16 दिसंबर, 2003 को सुप्रीम कोर्ट ने जब जांच CBI को सौंप दी तो एजेंसी ने आगे की जाँच की, शवों को कब्रों से बाहर निकाला (Exhumed), फ़ॉरेंसिक सबूत इकट्ठा किए और 19 अप्रैल, 2004 को चार्जशीट दायर की। मुक़दमे की सुनवाई महाराष्ट्र में स्थानांतरित की गई, और ट्रायल कोर्ट ने सभी 11 आरोपियों को रेप और हत्या का दोषी ठहराया।
अपील में हाईकोर्ट ने 11 आरोपियों की सज़ा और दोषसिद्धि में दखल देने से इनकार किया। इसके अलावा, कोर्ट ने कुछ पुलिस अधिकारियों और डॉक्टरों की बरी होने की सज़ा को भी रद्द कर दिया; इन अधिकारियों और डॉक्टरों को पहले IPC की धारा 201 और 218 के तहत लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया गया। ये आरोप जांच और पोस्टमॉर्टम की प्रक्रियाओं में कथित चूकों से जुड़े थे।
अगस्त, 2022 में गुजरात सरकार ने अपनी सज़ा माफ़ी नीति के तहत ग्यारह दोषियों को रिहा किया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गईं। 8 जनवरी, 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा माफ़ी के आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह फैसला दिया कि गुजरात सरकार सज़ा माफ़ी देने के लिए सही अथॉरिटी नहीं थी, क्योंकि इस मामले का ट्रायल महाराष्ट्र में ट्रांसफर कर दिया गया था। कोर्ट ने दोषियों को सरेंडर करने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा और सोनिया माथुर, तथा AoR आयुष आनंद पेश हुए।
Case Title – Bipinchand Kanaiyalal Joshi @ Lala Doctor v. State of Gujarat