कानून की कोई समझ नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने हत्या की अपील को लापरवाही से संभालने के लिए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की कड़ी आलोचना की
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि उसे भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 की धारा 304 पार्ट I (अपराधपूर्ण मानव वध जो हत्या की श्रेणी में नहीं आता, लेकिन जिसमें दोषी इरादा हो) और धारा 304 पार्ट II (अपराधपूर्ण मानव वध जो हत्या की श्रेणी में नहीं आता, लेकिन जिसमें दोषी जानकारी हो, पर खास इरादा न हो) के बीच के अंतर की कोई समझ नहीं है।
ये कड़ी टिप्पणियां जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने एक दोषी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कीं। दोषी ने हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी सज़ा को धारा 304, पार्ट II में बदल दिया गया।
संक्षेप में मामला
याचिकाकर्ता को IPC की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी ठहराया गया और सरायपाली, ज़िला महासमुंद के पहले अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने उसे जुर्माने के साथ आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, रायमोती पटेल नाम की एक महिला बांस के पेड़ के नीचे खून से लथपथ हालत में मिली थी। पूछने पर उसने बताया कि चिंतामई (आरोपी) ने उस पर हमला किया। आखिरकार उसकी मौत हो गई। उसके पति (शिकायतकर्ता) ने FIR दर्ज कराई। इसके बाद जांच पूरी होने पर ट्रायल कोर्ट ने धारा 302 के तहत आरोप तय किए और अंततः उसे दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई।
उसने हाई कोर्ट में अपील की, जहां कोर्ट ने इस बात पर विचार किया कि क्या उसका मामला IPC की धारा 300 के अपवाद 4 (हत्या की श्रेणी में न आने वाले अपराधपूर्ण मानव वध) के दायरे में आता है।
कोर्ट ने गुरमुख सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2009), राज्य बनाम संजीव नंदा (2012) और अर्जुन बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2017) के मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए पैमानों पर विचार किया और कहा कि आरोपी का मृतक की मौत का कारण बनने का कोई मकसद नहीं था। मौत का कारण बनने का कोई इरादा नहीं था, लेकिन ऐसी चोटें पहुंचाने से उसे यह पता होना चाहिए था कि उसके द्वारा पहुँचाई गई चोटों से मरने वाले की मौत हो सकती है।
अदालत ने कहा:
"इसलिए IPC की धारा 302 के तहत अपील करने वाले की सज़ा रद्द की जाती है। हालांकि, उसे IPC की धारा 304 पार्ट-II के तहत दोषी ठहराया जाता है और 10 साल की कठोर सज़ा सुनाई जाती है।"
अदालत ने हाई कोर्ट के बदलाव को "कानून की समझ" के बिना किया गया काम बताया और कहा:
"याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में अपील की। हाईकोर्ट ने हमेशा की तरह बहुत लापरवाही से और कानून की बिना किसी समझ के IPC की धारा 302 से धारा 304 पार्ट II में सज़ा बदलकर अपील को आंशिक रूप से मंज़ूरी दी।"
उल्लेखनीय है कि यह पहली बार नहीं है, जब जस्टिस पारदीवाला की बेंच ने हाईकोर्ट्स को धारा 304 पार्ट I और पार्ट II के बीच अंतर न समझने के लिए टोका है। 2023 में, जस्टिस पारदीवाला की बेंच ने विस्तार से समझाया था कि धारा 304, पार्ट I या पार्ट II कब लागू होती है।
फ़ैसले में कहा गया कि इस धारा का पहला हिस्सा तब लागू होगा जब 'अपराध करने का इरादा' हो, जबकि दूसरा हिस्सा तब लागू होगा जब ऐसा कोई इरादा न हो, लेकिन 'अपराध की जानकारी' (guilty knowledge) हो।
मौजूदा मामले में बेंच ने पाया कि हाईकोर्ट ने मरने वाले को लगी चोटों की प्रकृति, अपराध के लिए इस्तेमाल किए गए हथियार और घटना की शुरुआत को नज़रअंदाज़ किया। इसलिए इसने छत्तीसगढ़ राज्य को नोटिस जारी किया और हाई कोर्ट से स्पष्टीकरण मांगा कि उसके फ़ैसले को क्यों न रद्द किया जाए।
आगे कहा गया,
"याचिकाकर्ता को नोटिस जारी किया जाए और उससे कारण बताने को कहा जाए कि हाईकोर्ट का आदेश क्यों न रद्द किया जाए और ट्रायल कोर्ट द्वारा उसे हत्या के अपराध का दोषी ठहराने वाला फ़ैसला और आदेश क्यों न बहाल किया जाए। इस हिस्से पर हम मामले के सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए विचार करेंगे।"
इस मामले की सुनवाई अब 18 नवंबर को होगी।
Case Title : CHINTAMANI @ CHINTU PATEL Versus STATE OF CHHATTISGARH