वर्ष 2025 में सुप्रीम कोर्ट अत्यंत चर्चित और विवादास्पद मुद्दे में लंबे समय तक व्यस्त रहा विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR)।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने दिसंबर, 2025 में उन याचिकाकर्ताओं की दलीलें पूरी तरह सुन लीं, जिन्होंने चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई SIR प्रक्रिया को चुनौती दी।
चुनाव आयोग (ECI) ने 6 जनवरी, 2026 से अपने तर्क प्रस्तुत करने शुरू किए। यह लेख SIR की अवधारणा और इसके खिलाफ उठाए गए संवैधानिक व कानूनी सवालों को सरल भाषा में समझाने का प्रयास करता है।
SIR क्या है और इसे कैसे लागू किया जा रहा है?
SIR ऐसी प्रक्रिया है, जिसके तहत मतदाता सूची को लगभग नए सिरे से तैयार किया जाता है। इसमें जमीनी स्तर पर घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन किया जाता है। चुनाव आयोग के बूथ लेवल अधिकारी (BLO) घर-घर जाकर गणना प्रपत्र भरवाते हैं और मतदाता विवरण की गहन जांच करते हैं।
SIR की पहली घोषणा 24 जून 2025 को केवल बिहार राज्य के लिए की गई, विधानसभा चुनावों से पहले। इसके बाद 27 अक्टूबर, 2025 को दूसरे चरण की घोषणा हुई, जो 4 नवंबर से शुरू होकर 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू की गई।
इनमें अंडमान-निकोबार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, लक्षद्वीप, मध्य प्रदेश, पुडुचेरी, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल शामिल हैं।
चुनाव आयोग के अनुसार तेज शहरीकरण, बार-बार होने वाला प्रवासन, नए युवा मतदाताओं का जुड़ना, मौतों की सूचना न मिलना और विदेशी अवैध प्रवासियों के नाम मतदाता सूची में शामिल होना इन कारणों से त्रुटिरहित मतदाता सूची तैयार करने के लिए SIR आवश्यक है।
याचिकाकर्ता कौन हैं?
SIR को चुनौती देने वाली याचिकाएं 13 से अधिक याचिकाकर्ताओं ने दायर कीं, जिनमें एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), पीयूसीएल, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा, राजद सांसद मनोज झा, कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल और एनसीपी (एसपी) की सुप्रिया सुले शामिल हैं।
इस विवाद से जुड़े प्रमुख संवैधानिक और कानूनी प्रावधान
* अनुच्छेद 324: चुनावों की देखरेख और नियंत्रण चुनाव आयोग के पास।
* अनुच्छेद 325: धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर मतदाता सूची से किसी को बाहर नहीं किया जा सकता।
* अनुच्छेद 326: सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की गारंटी।
* जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21: मतदाता सूची के पुनरीक्षण से संबंधित प्रावधान।
धारा 16: मतदाता सूची से अयोग्यता के आधार
SIR के खिलाफ याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलीलें
1. नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का अधिकार नहीं
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि SIR एक अप्रत्यक्ष एनआरसी जैसी प्रक्रिया बन गई। नागरिकता तय करने का अधिकार केंद्र सरकार और विदेशी न्यायाधिकरणों के पास है, न कि चुनाव आयोग के पास। इसके बावजूद SIR में मतदाताओं से नागरिकता साबित करने का बोझ डाला जा रहा है, जो कानून के विपरीत है।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के लाल बाबू हुसैन (1995) फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि मतदाता सूची में शामिल व्यक्ति को नागरिक माना जाएगा और आपत्ति करने वाले पर इसका बोझ होगा।
2. नाम कटने से 'निलंबित नागरिकता' की स्थिति
याचिकाकर्ताओं ने चेताया कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटा दिया जाता है तो वह कई सरकारी योजनाओं और अधिकारों से भी वंचित हो सकता है, जिससे उसकी नागरिकता व्यवहारिक रूप से “निलंबित” हो जाती है।
3. SIR के गणना प्रपत्रों का कोई वैधानिक आधार नहीं
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि जिन गणना प्रपत्रों के जरिए SIR किया जा रहा है, उनका जनप्रतिनिधित्व अधिनियम या नियमों में कोई उल्लेख नहीं है। अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग कानून का पूरक हो सकता है, लेकिन संसद द्वारा बनाए गए कानून को दरकिनार नहीं कर सकता।
4. सामूहिक रूप से SIR की अनुमति नहीं
दलील दी गई कि धारा 21(3) केवल किसी एक निर्वाचन क्षेत्र या उसके हिस्से में विशेष पुनरीक्षण की अनुमति देती है, न कि एक साथ कई राज्यों में।
5. राज्यों के लिए अलग-अलग कारण नहीं बताए गए
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बिहार के लिए तो कारण बताए गए, लेकिन अन्य 12 राज्यों के लिए कोई ठोस और विशिष्ट आधार नहीं दिया गया। कुछ राज्यों में तो अगले कई वर्षों तक चुनाव भी नहीं हैं।
6. प्रक्रिया में पारदर्शिता की भारी कमी
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया:
* मतदाता जोड़ने-हटाने का डेटा सार्वजनिक नहीं किया गया।
* लाखों लोगों को बिना ठोस कारण के एक जैसे नोटिस भेजे गए।
* बिहार में ड्राफ्ट सूची से 65 लाख नाम हटाए गए, लेकिन बाद में लाखों नाम फिर जोड़े गए।
* डुप्लीकेशन कम होने के बजाय बढ़ गया।
योगेंद्र यादव के हलफनामे का हवाला देते हुए कहा गया कि बिहार की अंतिम सूची में भी लाखों डुप्लीकेट प्रविष्टियां मौजूद हैं।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट में अब चुनाव आयोग की दलीलें जारी हैं। SIR को लेकर यह बहस न केवल चुनावी प्रक्रिया, बल्कि नागरिकता, समानता और लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणाओं से भी जुड़ी हुई है। चुनाव आयोग के पक्ष को समझाने वाला दूसरा भाग जल्द प्रकाशित किया जाएगा।