सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस व्यक्ति ने समझौते के जरिए किसी संपत्ति से अपना हिस्सा छोड़ दिया, वह बाद में उसी संपत्ति के संबंध में कोई 'गिफ्ट डीड' नहीं बना सकता। कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के उस आदेश को गलत ठहराया, जिसमें ऐसे व्यक्ति द्वारा बनाई गई 'गिफ्ट डीड' को सही मान लिया गया, जिसने पहले ही एक समझौते के जरिए उस संपत्ति से अपना दावा छोड़ दिया।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने एक ऐसे मामले की सुनवाई की, जिसमें एक व्यक्ति ने 1986 के एक समझौते के तहत अपनी मां को मिली संपत्तियों पर अपना दावा छोड़ दिया (जिसके बदले में उसे एक घर के पूरे अधिकार मिल गए), लेकिन बाद में 2007 में उसी संपत्ति के संबंध में एक 'गिफ्ट डीड' बनाई।

कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या किसी पुराने पारिवारिक समझौते और 'समझौते की डिक्री' (जिसमें सभी पक्षों के संपत्ति अधिकारों को मान्यता दी गई) के असर को ठीक से समझे बिना, किसी 'गिफ्ट डीड' को वैध माना जा सकता है?

यह विवाद 19 अप्रैल 1959 को हुए एक पारिवारिक समझौते से शुरू हुआ, जिसमें पैतृक संपत्ति को परिवार के सदस्यों के बीच बांटा गया। इस समझौते के तहत, मधुसूदन रेड्डी को कुछ खास संपत्तियां मिलीं, जबकि करकलपहाड़ गांव की कुछ जमीनें उनकी मां, माणिक्यम्मा को दी गईं।

इसके बाद पारिवारिक संपत्ति से जुड़े मुकदमे के दौरान, फरवरी 1986 में मधुसूदन रेड्डी ने अनसूयम्मा और उनके दत्तक पुत्र वेंकटराजी रेड्डी के साथ समझौता किया। इस समझौते के तहत उन्होंने अपनी मां को मिली संपत्तियों पर अपना दावा छोड़ दिया और इसके बदले में हिमायतनगर वाले घर के पूरे अधिकार हासिल कर लिए। हाईकोर्ट ने इस समझौते को रिकॉर्ड पर लिया और सितंबर 1990 में समझौते की शर्तों के आधार पर अपील को स्वीकार कर लिया।

हालांकि, अप्रैल 2007 में मधुसूदन रेड्डी ने सिद्धार्थ रेड्डी के पक्ष में एक रजिस्टर्ड 'गिफ्ट डीड' बनाई, जिसके जरिए करकलपहाड़ गांव की कई जमीनों को उन्हें हस्तांतरित किया गया। अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि डीड (दस्तावेज़) में शामिल ज़मीनें 1959 के पारिवारिक समझौते के तहत मधुसूदन रेड्डी को आवंटित नहीं की गईं। इसके अलावा, ये वे संपत्तियां थीं जिन पर मधुसूदन रेड्डी ने 1986 के समझौते के तहत अपना दावा छोड़ दिया।

इसके बाद अनसूयम्मा, वेंकटराजी रेड्डी और परिवार के एक अन्य सदस्य ने एक मुकदमा दायर किया। इसमें उन्होंने मालिकाना हक की घोषणा, गिफ्ट डीड (उपहार विलेख) को शून्य और अमान्य घोषित करने, राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव (म्यूटेशन) और स्थायी निषेधाज्ञा (परमानेंट इंजंक्शन) की मांग की।

ट्रायल कोर्ट ने 2012 में इस मुकदमे को खारिज कर दिया था, और 2022 में तेलंगाना हाई कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।

जस्टिस संजय कुमार द्वारा लिखे गए फैसले में ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के एक जैसे निष्कर्षों को पलट दिया गया। इसमें पाया गया कि दोनों अदालतें पारिवारिक समझौते और हाईकोर्ट द्वारा मंजूर किए गए समझौते से सही निष्कर्ष निकालने में विफल रहीं।

अदालत ने कहा,

"यह निष्कर्ष इसलिए गलत निकला, क्योंकि संबंधित जज 19.04.1959 के पारिवारिक समझौते की बातों पर ध्यान नहीं दे पाए—जिसे मधुसूदन रेड्डी ने भी स्वीकार किया। साथ ही वे 24.02.1986 के उस समझौते को भी नहीं देख पाए, जिसके तहत मधुसूदन रेड्डी ने 1959 के पारिवारिक समझौते में माणिक्यम्मा को आवंटित संपत्तियों में अपना हिस्सा छोड़ने का फैसला किया। बदले में हैदराबाद के हिमायत नगर स्थित मकान पर पूरे अधिकार प्राप्त कर लिए थे।"

अदालत ने कहा,

"चूंकि हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले ऐसी बुनियादी गलतियों पर आधारित हैं, इसलिए इन्हें कायम नहीं रखा जा सकता।"

परिणामस्वरूप, अपील स्वीकार की गई और मुकदमा वादी के पक्ष में तय (डिक्री) कर दिया गया।

Case Title : B. ANASUYAMMA (DIED) PER LR AND ANOTHER versus B. MADHUSUDHAN REDDY (DIED) PER LRS AND OTHERS

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