सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों को अनिवार्य रूप से रोटेशन के आधार पर बदलने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि यह विषय संसद के विधायी अधिकार क्षेत्र में आता है और न्यायपालिका संसद को कानून में बदलाव करने का निर्देश नहीं दे सकती।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को इस संबंध में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के समक्ष अपनी मांग रखने की छूट दी।

क्या था मामला?

याचिका में परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) को चुनौती दी गई थी। इस प्रावधान के तहत SC/ST के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण उन क्षेत्रों में किया जाता है, जहां इन समुदायों की आबादी का अनुपात तुलनात्मक रूप से अधिक होता है।

याचिकाकर्ता जगदीश सिंह उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की 191-कादीपुर विधानसभा सीट के मतदाता हैं। उनका कहना था कि यह सीट लगभग सात दशकों से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है और इसमें कभी रोटेशन नहीं हुआ।

उन्होंने दलील दी कि लगातार एक ही सीट आरक्षित रहने से संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 का उल्लंघन होता है। इससे मतदाताओं को केवल SC उम्मीदवारों में से प्रतिनिधि चुनने के लिए बाध्य होना पड़ता है और आरक्षण का लाभ व्यापक समुदाय के बजाय कुछ परिवारों तक सीमित रह जाता है।

याचिकाकर्ता ने पंचायतों और नगरपालिकाओं में लागू अनुच्छेद 243D और 243T की तरह विधानसभा और संसद की आरक्षित सीटों में भी रोटेशन व्यवस्था लागू करने की मांग की थी।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि बहुदलीय लोकतंत्र में मतदाताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे जाति या धर्म के बजाय राजनीतिक दलों और उनकी विचारधारा के आधार पर मतदान करें।

जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने टिप्पणी की कि अधिक SC/ST आबादी वाले क्षेत्रों में आरक्षित सीटें निर्धारित करने से जातिगत विभाजन बढ़ता है या नहीं, यह विधायिका द्वारा विचार किए जाने वाला नीतिगत विषय है। केवल इस आधार पर कानून को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता।

उन्होंने कहा कि किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व कौन कर रहा है, यह मतदाता के लिए निर्णायक नहीं होना चाहिए। मतदाता राजनीतिक विचारधारा के आधार पर भी अपना प्रतिनिधि चुन सकते हैं।

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह अपनी मांग को लेकर गलत मंच पर आए हैं। आरक्षित सीटों के रोटेशन का मुद्दा संसद के समक्ष उठाया जाना चाहिए। उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में यह भी कहा कि विरोध-प्रदर्शन और नारेबाजी का यह अच्छा समय है, इसलिए इस मुद्दे पर भी प्रदर्शन किया जा सकता है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदान का अधिकार और किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने का अधिकार अलग-अलग हैं। सामान्य वर्ग के उम्मीदवार गैर-आरक्षित सीटों से चुनाव लड़ सकते हैं।

कोर्ट ने रोटेशन लागू करने का निर्देश देने से किया इनकार

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी माना था कि आरक्षित सीटों का रोटेशन आदर्श व्यवस्था हो सकती है, लेकिन न्यायिक संयम के आधार पर ऐसा निर्देश देने से इनकार कर दिया था।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 या परिसीमन अधिनियम में रोटेशन की अनिवार्यता का प्रावधान नहीं है। ऐसे में कोर्ट संविधान या कानून को दोबारा लिखकर रोटेशन की व्यवस्था नहीं जोड़ सकता।

अपने आदेश में पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता संसद और जनप्रतिनिधियों के समक्ष अपनी मांग रख सकते हैं और वर्ष 2008 में परिसीमन आयोग द्वारा अपनाई गई रोटेशन व्यवस्था के आधार पर इस सिद्धांत को लागू करने के लिए सहमति बनाने का प्रयास कर सकते हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी खारिज की थी याचिका

इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(c) को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया था।

हाईकोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 आरक्षित सीटों की संख्या निर्धारित करते हैं, जबकि उनके निर्धारण की प्रक्रिया संसद के विधायी अधिकार क्षेत्र में आती है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि सीटों का रोटेशन सामाजिक और राजनीतिक न्याय को आगे बढ़ाने का एक बेहतर तरीका हो सकता है, लेकिन संसद द्वारा कानून में ऐसा प्रावधान किए बिना अदालत रोटेशन लागू करने का निर्देश नहीं दे सकती।

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