सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस के कर्ज देने वाले साहूकार चेक बाउंस के मामलों में कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकते। ऐसे मामलों में उन्हें मुकदमे की शुरुआत में ही अपना साहूकारी लाइसेंस पेश करना होगा। कोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र में प्रॉमिसरी नोट के आधार पर दिए गए कर्ज की वसूली के लिए चेक बाउंस या दीवानी मुकदमा दायर करने पर संबंधित कानून के प्रावधान लागू होंगे।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की खंडपीठ ने गुरुवार (29 अक्टूबर) को एक विविध आवेदन पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। यह आवेदन व्योमेश महीपात्राय शाह ने दायर किया था। आवेदक को आशंका थी कि सुप्रीम कोर्ट के मई 2026 के फैसले का हवाला देकर महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस वाले साहूकार भी चेक बाउंस के मुकदमे चला सकते हैं।

यह मामला एम/एस मानसी फाइनेंस (चेन्नई) लिमिटेड बनाम एम. ललिता एवं अन्य में 26 मई 2026 को दिए गए फैसले से जुड़ा था। आवेदक ने बताया कि उस फैसले में तमिलनाडु के कानून के तहत प्रॉमिसरी नोट के आधार पर दिए गए कर्ज पर विचार किया गया। इसलिए उसे पूरे देश में लागू होने वाला ऐसा फैसला नहीं माना जाना चाहिए, जिससे महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस वाले साहूकारों को भी कर्ज वसूलने का अधिकार मिल जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मई 2026 का फैसला केवल तमिलनाडु के कानून से संबंधित था। उसे पूरे देश के लिए लागू सामान्य कानूनी सिद्धांत के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता।

कोर्ट ने दोनों राज्यों के कानूनों के बीच अंतर समझाते हुए कहा कि तमिलनाडु साहूकार अधिनियम, 1957 में परक्राम्य लिखतों, जिनमें प्रॉमिसरी नोट भी शामिल हैं, के आधार पर दिए गए अग्रिम को कर्ज की परिभाषा से बाहर रखा गया है। इसलिए वहां परक्राम्य लिखत के आधार पर सुरक्षित किया गया कर्ज कानूनी रूप से वसूली योग्य ऋण बना रह सकता है।

इसके विपरीत, महाराष्ट्र साहूकारी (विनियमन) अधिनियम, 2014 में अलग व्यवस्था है। इसकी धारा 2(13)(जे) में प्रॉमिसरी नोट के अलावा अन्य परक्राम्य लिखतों के आधार पर दिए गए अग्रिम को कर्ज की परिभाषा से बाहर रखा गया है। इसका अर्थ है कि महाराष्ट्र में प्रॉमिसरी नोट के आधार पर दिया गया कर्ज साहूकारी कानून के दायरे में आता है। ऐसे में बिना लाइसेंस के साहूकारी करने पर कानून की पाबंदियां लागू होंगी।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि महाराष्ट्र अधिनियम की धारा 4 बिना लाइसेंस साहूकारी करने पर रोक लगाती है, जबकि धारा 13 के तहत कानून का उल्लंघन करके दिए गए कर्ज की वसूली नहीं की जा सकती।

खंडपीठ ने कहा,

"महाराष्ट्र अधिनियम की धारा 4 के तहत बिना लाइसेंस प्रॉमिसरी नोट के आधार पर इस तरह कर्ज देना प्रतिबंधित है और धारा 13 के तहत ऐसा कर्ज वसूली योग्य नहीं है। परिणामस्वरूप, तमिलनाडु के विपरीत महाराष्ट्र में ऐसा कर्ज परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के स्पष्टीकरण के तहत कानूनी रूप से वसूली योग्य ऋण नहीं होगा।"

कोर्ट ने आगे कहा कि महाराष्ट्र में चेक बाउंस या कर्ज वसूली से जुड़ी किसी भी कार्यवाही में साहूकार को शुरुआत में ही अपना लाइसेंस पेश करके अदालत को संतुष्ट करना होगा।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने मई 2026 के फैसले में तमिलनाडु या महाराष्ट्र के साहूकारी कानूनों के प्रावधानों पर विस्तार से विचार नहीं किया। इसलिए खंडपीठ ने अपने पुराने फैसले पर अलग से स्पष्टीकरण जारी करने की आवश्यकता नहीं समझी।

खंडपीठ ने कहा कि यदि महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस साहूकार द्वारा प्रॉमिसरी नोट के आधार पर दिए गए कर्ज की वसूली के खिलाफ कोई कानूनी रोक है और इस कारण वह कर्ज परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत कानूनी रूप से वसूली योग्य ऋण नहीं है, तो संबंधित अदालत इस मुद्दे पर विचार कर सकती है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित पक्ष इस कानूनी मुद्दे को मामले की सुनवाई कर रही निचली अदालत या उच्चतर अदालत के समक्ष उठा सकते हैं। अदालतें मामले के तथ्यों और लागू कानून के आधार पर इस पर निर्णय लेंगी।

इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि तमिलनाडु से जुड़े उसके मई 2026 के फैसले का इस्तेमाल महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस साहूकारों को चेक बाउंस के मामलों में कार्रवाई करने का स्वतः अधिकार देने के लिए नहीं किया जा सकता।

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