सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ ट्रिब्यूनल में कोर्ट फीस से छूट के वक्फ संस्थानों के दावे पर सवाल उठाया
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य वक्फ ट्रिब्यूनल के सामने होने वाली कार्यवाही में वक्फ संस्थानों को कोर्ट फीस देने से छूट देने के कानूनी आधार पर सवाल उठाया।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच गुजरात हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस आदेश में हाईकोर्ट ने अपने पिछले फैसले का हवाला देते हुए वक्फ संस्थानों द्वारा कोर्ट फीस न देने के कारण उनके मुकदमों को खारिज करने के फैसले को सही ठहराया था। हाईकोर्ट ने अपने पिछले फैसले में कहा था कि वक्फ संस्थानों को राज्य वक्फ ट्रिब्यूनल के सामने कोर्ट फीस देने से छूट नहीं है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील एजाज मकबूल ने गुजरात हाईकोर्ट के दिसंबर 2025 के फैसले को चुनौती देने वाली अतिरिक्त याचिकाएं दायर करने के लिए समय मांगा।
हालांकि, जस्टिस नरसिम्हा ने कोर्ट फीस से छूट के दावे के आधार पर सवाल उठाया।
उन्होंने पूछा,
"छूट कैसे मिल सकती है? ऐसा कौन-सा कानून है, जो आपको कोर्ट फीस से छूट लेने की अनुमति देता है?"
मकबूल ने जवाब दिया कि याचिकाकर्ता इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखेंगे और अनुरोध किया कि इस मामले पर कुछ समय बाद सुनवाई की जाए। आखिरकार, कोर्ट ने समय दे दिया और याचिका की सुनवाई 7 अगस्त, 2026 के लिए तय कर दी।
17 दिसंबर, 2025 को हाईकोर्ट ने वक्फ संस्थानों द्वारा दायर याचिकाओं के एक समूह को खारिज किया था। इन याचिकाओं में ट्रिब्यूनल के उन आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनमें वक्फ संपत्तियों से जुड़े विवादों पर होने वाली कार्यवाही को कोर्ट फीस की कमी के कारण खारिज किया गया था। कोर्ट ने फैसला दिया कि वक्फ अधिनियम की धारा 83 के तहत गुजरात राज्य वक्फ ट्रिब्यूनल के सामने शुरू की गई कार्यवाही के लिए वक्फ संस्थानों को कोर्ट फीस देने से कोई पूर्ण छूट या माफी उपलब्ध नहीं है।
हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज किया कि कोर्ट फीस देने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि धारा 83 के तहत कार्यवाही "वाद" (plaint) या "मुकदमे" (suit) के बजाय "आवेदन" (Application) के माध्यम से शुरू की जाती है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी कार्यवाही में वक्फ संपत्तियों से जुड़े अधिकारों का निर्णय शामिल होता है, जिसमें मकान मालिक-किरायेदार विवाद भी शामिल हैं, और ये कार्यवाही दीवानी मुकदमों की तरह ही संचालित होती हैं, जिनमें लिखित बयान, मुद्दों का निर्धारण, साक्ष्य और अंतिम निर्णय शामिल होते हैं।
कोर्ट ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता गुजरात में ऐसी कार्यवाही के लिए कोर्ट फीस से माफी देने वाली किसी भी अधिसूचना, परिपत्र या वैधानिक प्रावधान को दिखाने में विफल रहे हैं। इसने ट्रिब्यूनल के उस फ़ैसले को भी सही ठहराया, जिसमें CPC के आदेश VII नियम 11 के तहत कार्यवाही को खारिज कर दिया गया था; ऐसा तब किया गया जब वादी, कमियों को सुधारने के कई मौक़े दिए जाने के बावजूद, ज़रूरी कोर्ट फ़ीस जमा करने में नाकाम रहे।
इसके बाद 20 जनवरी, 2026 को गुजरात हाईकोर्ट ने याचिकाओं के एक और समूह को खारिज किया। इन याचिकाओं में ट्रिब्यूनल के उन आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनमें कम कोर्ट फ़ीस के कारण मुकदमों को खारिज कर दिया गया। कोर्ट ने यह माना कि दिसंबर 2025 के अपने फ़ैसले में दर्ज किए गए कारण इन याचिकाओं पर भी लागू होंगे। इस आधार पर उन्हें खारिज किया।
Case Title – Ahmedabad Sunni Muslim Waqf Committee v. Gujarat State Waqf Tribunal