सुप्रीम कोर्ट ने श्रीदेवी की चेन्नई प्रॉपर्टी पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया; विरोधी दावे पर बोनी कपूर, जाह्नवी और खुशी को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने चेन्नई में ईस्ट कोस्ट रोड के पास दिवंगत एक्ट्रेस श्रीदेवी की प्रॉपर्टी पर दावा करने वाले मुकदमे को फिर से शुरू करने की याचिका पर नोटिस जारी किया।
याचिकाकर्ता एमसी शिवकामी और एमसी नटराजन ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देते हुए कोर्ट का रुख किया, जिसमें श्रीदेवी के पति बोनी कपूर और बेटियों जाह्नवी और खुशी कपूर की अर्जी पर उनके मुकदमे को खारिज कर दिया गया था।
जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पिल्लई की बेंच ने इस याचिका पर बोनी कपूर, जाह्नवी और खुशी कपूर को नोटिस जारी किया और सुनवाई की अगली तारीख तक यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया।
एमसी शिवकामी, उनके भाई एमसी नटराजन और उनकी मां चंद्रभानु जमीन में हिस्सेदारी का दावा कर रहे हैं और 4 सेल डीड (बिक्री विलेख) को अमान्य घोषित करने की मांग कर रहे हैं, जिनके जरिए बोनी की दिवंगत पत्नी श्रीदेवी और उनकी बहन ने 4.7 एकड़ की प्रॉपर्टी हासिल की थी। उन्होंने दावा किया कि सेल डीड धोखाधड़ी से तैयार की गई थीं और प्रॉपर्टी में उनका भी हिस्सा है. क्योंकि यह उनके दादाजी की है।
ट्रायल कोर्ट के सामने कपूर ने CPC के ऑर्डर 7 रूल 11 (a) और (b) और धारा 151 के तहत एक अर्जी दाखिल की। उन्होंने तर्क दिया कि वादियों का दावा कानूनी रूप से टिकने लायक नहीं है और चंद्रभानु की शादी ही अमान्य है, क्योंकि यह पहली शादी के रहते हुए की गई, जिससे यह कानूनन शुरू से ही अमान्य (void ab initio) हो गई और यह बिगैमी (एक से अधिक विवाह) का मामला बनता है।
हालांकि, ट्रायल जज ने शिकायत खारिज करने की कपूर की अर्जी को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि कपूर द्वारा उठाए गए मुद्दे तथ्यों से जुड़े विवादित सवाल हैं, जिन पर केवल ट्रायल के दौरान ही विचार किया जा सकता है। इस आदेश को चुनौती देते हुए कपूर और उनकी बेटियों ने हाई कोर्ट का रुख किया।
कपूर ने दावा किया कि याचिका में इस तथ्य को छिपाया गया, और किसी महत्वपूर्ण और कानूनी रूप से प्रासंगिक तथ्य को छिपाना कोर्ट को गुमराह करने की जानबूझकर की गई कोशिश है। उन्होंने दावा किया कि यह काम धोखाधड़ी के बराबर है, जिससे दावे की बुनियाद ही खत्म हो जाती है।
यह तर्क दिया गया कि वादियों ने पहले भी इस संपत्ति पर दावा किया, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया और सुप्रीम कोर्ट ने भी उस फैसले को सही ठहराया। यह भी कहा गया कि इन तथ्यों को छिपाया गया और ट्रायल कोर्ट ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। कपूर ने तर्क दिया कि वादियों ने अपने पक्ष में आदेश पाने के लिए कोर्ट के साथ धोखाधड़ी की थी।
हाईकोर्ट की जस्टिस टीवी तमिलसेल्वी ने इस दावे को कानून की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल करके संपत्ति हड़पने की "परेशान करने वाली" कोशिश बताया और कहा कि कानून के तहत इसकी इजाज़त नहीं है।
हाईकोर्ट को कपूर की दलील में दम लगा और उसने पाया कि भले ही वादी अपने पिता चंद्रशेखरन की पहली शादी के बारे में जानते थे। फिर भी उन्होंने अपनी शिकायत में इस तथ्य को छिपाया। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि हालांकि बिक्री विलेख (सेल डीड) 1988 में ही बन गया था, लेकिन चंद्रशेखरन ने अपने जीवनकाल में इसे कभी चुनौती नहीं दी। कोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि वादी एमसी चंद्रशेखरन के क्लास-1 कानूनी उत्तराधिकारी नहीं हैं, इसलिए उन्हें मुकदमा आगे बढ़ाने का कोई कानूनी अधिकार (लोकस स्टैंडी) नहीं था।
कोर्ट ने यह भी देखा कि बिक्री विलेख 1988 से ही मौजूद थे, और यह बिल्कुल भी यकीन करने लायक नहीं था कि वादियों को इसके बारे में 2023 में ही पता चला। इस प्रकार, कोर्ट ने फैसला सुनाया कि 40 साल बाद दायर की गई याचिका समय-सीमा (लिमिटेशन) के कारण खारिज होने योग्य थी। इसलिए सभी तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कपूर की याचिका स्वीकार करते हुए शिकायत को खारिज किया और उसी के अनुसार आदेश दिया।
Case Details: M.C.SIVAKAMI AND ANR. v BONEY KAPOOR AND ORS|SLP(C) No. 23267/2026