स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में पड़े व्यक्ति से लाइफ सपोर्ट हटाने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (15 जनवरी) को उस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें 32 वर्षीय एक व्यक्ति के जीवनरक्षक उपचार (life support) को हटाने की अनुमति मांगी गई है। यह व्यक्ति पिछले 12 वर्षों से अपरिवर्तनीय स्थायी वेजिटेटिव अवस्था (irreversible permanent vegetative state) में है, जब वह एक इमारत से गिर गया था। कोर्ट द्वारा गठित दो मेडिकल बोर्डों ने रिपोर्ट दी है कि उसके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है।
जस्टिस जे.बी. परडीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ इस मामले में पिता द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें अपने बेटे से सभी जीवनरक्षक उपचार हटाने की अनुमति मांगी गई है। यह मामला Common Cause बनाम भारत संघ (2018) के संविधान पीठ के फैसले और उसके जनवरी 2023 में संशोधित दिशा-निर्देशों के तहत सुना जा रहा है, जिनमें सम्मान के साथ मरने के अधिकार को मान्यता दी गई थी।
यदि कोर्ट इस याचिका को स्वीकार करता है, तो यह पहला मामला होगा जिसमें Common Cause के दिशा-निर्देशों को न्यायिक रूप से लागू किया जाएगा।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट रश्मि नंदकुमार ने अदालत को गियान कौर, अरुणा शॉनबाग और Common Cause जैसे मामलों का हवाला देते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने यह स्थापित किया है कि जीवन के अधिकार में गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार भी शामिल है।
उन्होंने कहा कि दोनों मेडिकल बोर्डों ने साफ तौर पर कहा है कि मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है। उन्होंने अस्पताल से क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन और हाइड्रेशन (खान-पान और पानी) हटाने की अनुमति मांगी, ताकि मरीज को उपयुक्त पैलिएटिव देखभाल के तहत प्राकृतिक रूप से जाने दिया जा सके।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अस्पतालों में स्थायी रूप से मेडिकल बोर्ड गठित होने चाहिए क्योंकि यह एक समय-संवेदनशील प्रक्रिया है।
केंद्र सरकार की दलील
केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने भी माना कि मरीज स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में है और उसके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है। उन्होंने बताया कि अभी तक ऐसा कोई मामला नहीं है जहां Common Cause के दिशा-निर्देशों को वास्तव में लागू किया गया हो।
उन्होंने कहा कि पैसिव यूथेनेशिया (passive euthanasia) में जीवनरक्षक उपायों को हटाया जा सकता है, लेकिन मृत्यु का कारण मूल बीमारी ही होना चाहिए।
उन्होंने अरुणा शॉनबाग के मामले से तुलना करते हुए कहा कि वहां नर्सिंग स्टाफ जीवनरक्षक सहायता हटाने के पक्ष में नहीं था, जबकि इस मामले में माता-पिता अपने बेटे के हित में यह फैसला चाहते हैं।
कोर्ट की टिप्पणी
जस्टिस परडीवाला ने कहा कि यह एक अत्यंत संवेदनशील और कठिन विषय है और इसमें नैतिक दुविधा जुड़ी हुई है कि क्या मनुष्य ऐसे निर्णय ले सकता है।
प्राथमिक मेडिकल बोर्ड ने बताया कि मरीज को सांस लेने के लिए ट्रैकियोस्टोमी ट्यूब लगी है और भोजन के लिए गैस्ट्रोस्टोमी ट्यूब है। शरीर पर गंभीर बेड सोर हैं।
AIIMS द्वारा गठित द्वितीय मेडिकल बोर्ड ने भी यही निष्कर्ष दिया कि सुधार की कोई संभावना नहीं है।
जस्टिस परडीवाला ने रिपोर्ट को “दुखद” बताते हुए कहा कि ऐसे हाल में व्यक्ति इस तरह जीवन नहीं जी सकता। अंतिम आदेश देने से पहले कोर्ट ने माता-पिता से मिलने की इच्छा भी जताई।
मामले का पिछला इतिहास
पिता ने पहले 2024 में सुप्रीम कोर्ट से अपने बेटे के लिए मेडिकल बोर्ड गठित करने की मांग की थी, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने अस्वीकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने तब इलाज जारी रखने का निर्देश दिया था। बाद में बेटे की हालत और बिगड़ने पर पिता ने वर्तमान याचिका दायर की।
अब सुप्रीम कोर्ट इस अत्यंत संवेदनशील मामले में फैसला सुरक्षित रख चुका है।