कानूनी वारिसों को पक्षकार न बनाने से अपील स्वतः निरस्त नहीं होगी, यदि मृतक के हित अन्य वारिसों द्वारा पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्वित हों : सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-01-12 15:30 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (12 जनवरी) को महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि यदि किसी मृत पक्षकार के हितों का पर्याप्त रूप से उसके अन्य कानूनी वारिसों द्वारा प्रतिनिधित्व किया जा रहा है, तो उसके किसी एक वारिस को प्रतिस्थापित (सब्स्टीट्यूट) न किए जाने मात्र से मुकदमा या अपील अभियोजन से समाप्त (abatement) नहीं मानी जा सकती।

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्जल भुइयां की खंडपीठ ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें केवल इस आधार पर विशिष्ट प्रदर्शन (Specific Performance) की डिक्री के खिलाफ अपील को समाप्त मान लिया गया था कि मृत विक्रेता के एक कानूनी वारिस को पक्षकार नहीं बनाया गया, जबकि अन्य वारिस रिकॉर्ड पर मौजूद थे और हितों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।

कोर्ट ने अपने हालिया फैसले Shivashankara बनाम HP Vedavyasa Char (2023) का हवाला देते हुए कहा कि—

“जहां मृत पक्षकार की संपत्ति का पर्याप्त प्रतिनिधित्व उसके कानूनी वारिसों द्वारा किया जा रहा हो, वहां कुछ वारिसों के छूट जाने मात्र से कार्यवाही समाप्त नहीं होती।”

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद दो जुड़े हुए मुकदमों से जुड़ा था। पहला मुकदमा विशिष्ट प्रदर्शन के लिए था, जो संपत्ति के मूल मालिक (अब मृत अपीलकर्ता) के खिलाफ दायर किया गया था और वर्ष 2000 में वादी के पक्ष में डिक्री पारित हुई थी। दूसरा मुकदमा उन खरीदारों द्वारा दायर किया गया था, जिन्होंने इस संपत्ति को पहले मुकदमे के लंबित रहते खरीदा था।

इन मामलों से जुड़ी अपीलें हाईकोर्ट में लंबित थीं। इसी दौरान 2005 में विक्रेता की मृत्यु हो गई और 2006 में उसके चार कानूनी वारिसों को पक्षकार बनाया गया। बाद में उनमें से एक, मुरारीलाल, की 2007 में मृत्यु हो गई, लेकिन उसके कानूनी वारिस तुरंत रिकॉर्ड पर नहीं लाए गए।

हालांकि, 2013 में हाईकोर्ट ने माना कि अपील समाप्त नहीं हुई है, और बाद में मुरारीलाल के वारिसों को पक्षकार भी बनाया गया। लेकिन 2017 में हाईकोर्ट ने अपना रुख बदलते हुए अपील को समाप्त (abated) घोषित कर दिया।

इस आदेश को विक्रेता के वारिसों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

जस्टिस मनोज मिश्रा द्वारा लिखित निर्णय में कहा गया कि abatement को यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जाना चाहिए। असली कसौटी यह है कि मृत पक्षकार के हितों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व रिकॉर्ड पर मौजूद पक्षकारों द्वारा हो रहा है या नहीं।

इस मामले में, मृत विक्रेता की संपत्ति का प्रतिनिधित्व उसके तीन जीवित वारिसों और संपत्ति के खरीदारों द्वारा किया जा रहा था, जिनका अधिकार lis pendens के सिद्धांत के अधीन था। इसलिए अदालत ने कहा कि मृत विक्रेता के हितों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो रहा था और अपील समाप्त नहीं मानी जा सकती।

कोर्ट ने कहा—

“मृत पक्षकार के सभी वारिसों को प्रतिस्थापित न करना और उसके किसी एक वारिस को प्रतिस्थापित न करना — इन दोनों में स्पष्ट अंतर है। यदि अन्य वारिस रिकॉर्ड पर हैं और मृत पक्षकार के हितों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, तो कार्यवाही समाप्त नहीं होती।”

कानूनी सिद्धांत

कोर्ट ने इस संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांत भी तय किए, जिनमें कहा गया कि:

यदि मृत पक्षकार के हितों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो रहा हो, तो मुकदमा समाप्त नहीं होगा।

विशिष्ट प्रदर्शन के मुकदमे में विक्रेता आवश्यक पक्षकार होता है।

Lis pendens के दौरान संपत्ति का हस्तांतरण शून्य नहीं होता, लेकिन वह अंतिम डिक्री के अधीन होता है।

ऐसे खरीदार अपील कर सकते हैं, लेकिन विक्रेता और उसके कानूनी वारिसों का रिकॉर्ड पर होना आवश्यक है।

अंतिम आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए अपील स्वीकार की और मामले को मेरिट पर निर्णय के लिए हाईकोर्ट को वापस भेज दिया।

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