सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण मुआवज़े में असमानता पर जताई चिंता, कानून में समानता लाने का सुझाव

Update: 2026-01-20 08:00 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित मुआवज़ा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत अधिग्रहित भूमि के लिए मुआवज़े और अन्य वैधानिक लाभों के आकलन में स्पष्ट असमानता दिखाई देती है।

Supreme Court of India ने सुझाव दिया कि भारत के अटॉर्नी जनरल और केंद्र सरकार इस मुद्दे पर विचार करें और यह देखें कि क्या विधायी ढांचे को पुनः परखा जा सकता है, ताकि संविधान के अनुच्छेद 300A (जो संपत्ति के अधिकार को संवैधानिक संरक्षण देता है) के अनुरूप भूमि के बाज़ार मूल्य के निर्धारण में समानता लाई जा सके।

मामला और पृष्ठभूमि

यह आदेश 13 जनवरी को पारित किया गया, जब 21 भू-स्वामियों की ओर से दायर एक आवेदन पर सुनवाई हो रही थी। इन भू-स्वामियों की भूमि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 के तहत अधिग्रहित की गई थी, लेकिन उनका कहना था कि उन्हें उचित मुआवज़ा नहीं दिया गया।

खंडपीठ में चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल थे।

पुरा मामला 

मुआवज़े के निर्धारण से असंतुष्ट होकर भू-स्वामियों ने मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के समक्ष याचिका दायर की। इसी बीच पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने 20 मार्च 2025 को फैसला सुनाते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम की धारा 3G और 3J को असंवैधानिक घोषित कर दिया।

उच्च न्यायालय ने कहा कि ये प्रावधान भू-स्वामियों को वे लाभ देने से वंचित करते हैं, जो उन्हें भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 और 2013 के अधिनियम के तहत मिलते हैं। इसके परिणामस्वरूप, भू-स्वामियों की याचिका निरर्थक हो गई और उन्होंने उसे वापस ले लिया। हालांकि, 30 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के इस निर्णय पर रोक लगा दी।

लेकिन तब तक सीमा-काल (limitation) की बाधा के कारण भू-स्वामी नई याचिका दाख़िल नहीं कर सके। इस असाधारण स्थिति में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए जिला न्यायालय में हुई खारिजी को पुनर्जीवित किया।

सुनवाई के दौरान उठे प्रमुख मुद्दे

सुप्रीम कोर्ट ने दो अहम चिंताएं रेखांकित कीं—

धारा 3G(5) के तहत मुआवज़ा बढ़ाने के लिए मध्यस्थता का सहारा लेना पड़ता है, जहां फैसला किसी न्यायिक अधिकारी द्वारा नहीं, बल्कि केंद्र सरकार द्वारा नामित अधिकारी (अक्सर कलेक्टर) द्वारा किया जाता है।

ऐसे अधिकारियों के पास भूमि के बाज़ार मूल्य और वैधानिक लाभों जैसे जटिल मुद्दों पर निर्णय लेने का आवश्यक न्यायिक अनुभव नहीं होता।

इसके विपरीत, भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत मुआवज़े में वृद्धि का अधिकार न्यायालयों को है और उच्च न्यायालय में अपील का भी व्यापक अवसर मिलता है। साथ ही, 2013 का अधिनियम अतिरिक्त वैधानिक लाभ और अधिक दर से मुआवज़ा सुनिश्चित करता है।

अदालत ने टिप्पणी की कि 1956 के अधिनियम के तहत भूमि गंवाने वाले भू-स्वामी और 2013 के अधिनियम के तहत भूमि गंवाने वाले भू-स्वामी बिना किसी “बुद्धिगम्य भेद” के अलग-अलग वर्गों में रखे गए हैं, जिससे गंभीर असंतोष उत्पन्न होता है।

कानून में पुनर्विचार का सुझाव

हालांकि कोर्ट ने माना कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम का उद्देश्य तेज़ और समयबद्ध अधिग्रहण है, लेकिन उसने कहा कि यह उद्देश्य बनाए रखते हुए भी मुआवज़े के आकलन में समानता लाई जा सकती है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह विषय मुख्य रूप से विधायिका के क्षेत्राधिकार में आता है, इसलिए उसने कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की। फिर भी, कोर्ट ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह अनुच्छेद 300A के आलोक में मुआवज़े के निर्धारण की प्रक्रिया में समानता लाने पर गंभीरता से विचार करे।

सुप्रीम कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि इस आदेश की एक प्रति अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय को भेजी जाए।

मामले की अगली सुनवाई 21 अप्रैल को होगी। तब तक उच्च न्यायालय के आदेश पर लगी रोक जारी रहेगी।

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