जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ तीनों आरोप साबित, सरकारी आवास में मिली भारी नकदी का नहीं मिला संतोषजनक स्पष्टीकरण: लोकसभा समिति

Update: 2026-08-12 11:53 GMT

लोकसभा में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच करने वाली समिति ने अपनी रिपोर्ट में उनके खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को साबित माना है।

समिति ने कहा कि उनके सरकारी आवास के स्टोर रूम में बड़ी मात्रा में ऐसी नकदी मिली थी जिसका कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।

समिति ने यह भी माना कि नकदी मिलने के बाद उससे जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित नहीं रखा गया और जस्टिस वर्मा की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण “टालमटोल वाले, अधूरे और प्रभावी रूप से भ्रामक” है।

जस्टिस वर्मा इलाहाबाद और दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस रहे हैं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अगस्त 2025 में जजेज इन्क्वायरी अधिनियम, 1968 के तहत उनके खिलाफ आरोपों की जांच के लिए समिति का गठन किया था। समिति की रिपोर्ट बुधवार को लोकसभा में पेश की गई।

समिति ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ तीन आरोप तय किए थे। पहला, बिना हिसाब वाली नकदी के मिलने और उसके कब्जे से संबंधित था। दूसरा, नकदी मिलने के बाद महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित रखने में विफलता से जुड़ा था। तीसरा आरोप नकदी की मौजूदगी के संबंध में भ्रामक स्पष्टीकरण देने का था।

समिति ने कहा कि पहला आरोप नई दिल्ली स्थित 30 तुगलक क्रिसेंट के सरकारी आवास के स्टोर रूम में बड़ी मात्रा में बिना हिसाब वाली भारतीय मुद्रा मिलने से संबंधित था।

14-15 मार्च 2025 की रात आग लगने के बाद स्टोर रूम में 500 रुपये के नोटों के बंडल, ढेर और अलग-अलग जगहों पर पड़े जले, आधे जले तथा गीले नोट देखे जाने की बात कई गवाहों ने कही थी।

दिल्ली अग्निशमन सेवा और पुलिस के कई अधिकारियों ने समिति के समक्ष नकदी देखने की पुष्टि की। तस्वीरों और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री से भी इन बयानों को समर्थन मिला।

हालांकि, समिति ने कहा कि नोटों को सुरक्षित नहीं रखा गया और उनकी उचित गिनती या सूची तैयार नहीं की गई। इसलिए स्टोर रूम में वास्तव में कितनी नकदी थी, इसकी सटीक राशि निर्धारित करना संभव नहीं है।

जस्टिस वर्मा की ओर से लगातार यह कहा गया कि स्टोर रूम सरकारी आवास से अलग था और उन्हें उस पर कोई पहुंच या नियंत्रण नहीं था।

समिति ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। समिति ने कहा कि सरकारी आवास के परिसर में बड़ी मात्रा में नकदी मिलना यह स्थापित करता है कि उस परिसर पर जस्टिस वर्मा का प्रभावी नियंत्रण था।

समिति ने कहा कि जस्टिस वर्मा नकदी के स्वामित्व, उसके स्रोत या वहां मौजूद होने के संबंध में कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहे।

हालांकि, समिति ने स्पष्ट किया कि उसकी रिपोर्ट का अर्थ यह नहीं है कि आपराधिक अर्थ में नोटों का प्रत्यक्ष व्यक्तिगत स्वामित्व जस्टिस वर्मा का साबित हो गया।

समिति ने कहा,

“जो स्थापित होता है वह यह है कि जज के कब्जे वाले सरकारी परिसर में बड़ी मात्रा में बिना स्पष्टीकरण वाली नकदी मिली, स्टोर रूम उस परिसर का हिस्सा था और जज उसकी मौजूदगी, स्रोत या स्वामित्व के संबंध में संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहे।”

समिति ने यह भी माना कि जली हुई नकदी को सुरक्षित नहीं रखना पुलिस की ओर से “महत्वपूर्ण चूक” थी। हालांकि, समिति ने कहा कि इससे उन अधिकारियों के बयानों का महत्व समाप्त नहीं होता, जिन्होंने मौके पर नकदी को देखा और उसकी पहचान की थी।

रिपोर्ट के अनुसार, परिसर को सील करने और निरीक्षण करने से पहले नकदी और स्टोर रूम की स्थिति को ठीक से सुरक्षित नहीं रखा गया। नोटों को जब्त नहीं किया गया, उनकी सूची नहीं बनाई गई और उचित पंचनामा भी तैयार नहीं किया गया। स्टोर रूम को तत्काल सील भी नहीं किया गया। बाद में वहां सफाई की गई और इसके बाद नकदी उपलब्ध नहीं रही।

समिति ने घटना के बाद जस्टिस वर्मा के घरेलू कर्मचारियों के संपर्क में रहने के साक्ष्य को भी महत्वपूर्ण माना। इनमें उनके निजी सचिव राजिंदर सिंह कार्की और घरेलू कर्मचारी मोहम्मद राहिल शामिल थे। एक गवाह सी.जी. रावत ने बताया कि आग बुझने के बाद उसने कार्की और राहिल को स्टोर रूम के पास सफाई करते देखा था।

हालांकि, समिति ने यह नहीं कहा कि जस्टिस वर्मा ने स्वयं नकदी हटाई थी। समिति के अनुसार, महत्वपूर्ण बात यह थी कि उन्होंने उस परिसर में महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए, जबकि वह घटना से अवगत हो चुके थे और परिसर से जुड़े लोगों के संपर्क में थे।

समिति ने यह तर्क भी स्वीकार नहीं किया कि साक्ष्य सुरक्षित रखने की पूरी जिम्मेदारी केवल पुलिस और अग्निशमन अधिकारियों की थी।

समिति ने कहा कि अधिकारियों की अपनी चूक के बावजूद जस्टिस वर्मा को यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने चाहिए थे कि नकदी सुरक्षित रखी जाए, उसकी सूची बनाई जाए और घटना की सूचना उचित अधिकारियों को दी जाए। इस आधार पर दूसरा आरोप भी साबित माना गया।

तीसरे आरोप पर समिति ने कहा कि शुरुआत में जस्टिस वर्मा ने बिना हिसाब वाली नकदी से जुड़े सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज किया। बाद में उनकी दलील का केंद्र नकदी जब्त न किए जाने, नोटों के वहां रखे जाने की संभावना और किसी बड़ी साजिश की आशंका पर चला गया।

समिति ने कहा कि इन दावों के समर्थन में जस्टिस वर्मा ने कोई साक्ष्य पेश नहीं किया और न ही बचाव पक्ष के गवाहों की सूची दी।

समिति ने यह भी दर्ज किया कि प्रस्तुतिकरण पक्ष की गवाही पूरी होने और गवाहों से जिरह हो जाने के बाद जस्टिस वर्मा ने कार्यवाही में हिस्सा लेना बंद कर दिया।

समिति ने कहा कि कार्यवाही से उनका हटना अपने आप में आरोप साबित करने वाला तथ्य नहीं है, लेकिन उनके द्वारा लगाए गए आरोपों के समर्थन में साक्ष्य पेश न किए जाने के संदर्भ में इसका महत्व है।

समिति के अनुसार, जस्टिस वर्मा का स्पष्टीकरण स्वतंत्र अधिकारियों द्वारा देखी गई बड़ी मात्रा में नकदी की मौजूदगी का पर्याप्त उत्तर नहीं देता था।

उन्होंने कथित रूप से की गई जांच, घटनास्थल को सुरक्षित रखने के लिए उठाए गए कदमों या किसी बाहरी साजिश के आरोपों को साबित करने के संबंध में भी पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत नहीं की। इसी आधार पर समिति ने तीसरे आरोप को भी साबित माना।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए समिति गठित की थी।

समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार ने की। इसमें तत्कालीन बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर, जो बाद में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत हुए, और वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य शामिल थे।

समिति ने 18 मई 2026 को अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी थी। मामला मार्च 2025 में नई दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में लगी आग के बाद सामने आया था। आग के बाद वहां बड़ी मात्रा में कथित तौर पर बिना हिसाब वाली नकदी मिलने की बात सामने आई थी।

जस्टिस वर्मा ने आरोपों से इनकार किया था और 10 अप्रैल 2025 को जज के पद से इस्तीफा दे दिया था।

समिति ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और राजा ठाकरे तथा सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा और सिद्धार्थ अग्रवाल सहित अधिवक्ताओं करण उमेश सालवी और समीक्षा दुआ के सहयोग की भी सराहना की है।

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