'लक्षित प्रतिशोध' का मामला: ITAT नियुक्ति एक दशक तक रोकने पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया

Update: 2026-01-31 07:21 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी की आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) में नियुक्ति को लगभग एक दशक तक रोके रखने के मामले में केंद्र सरकार पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए इसे “जानबूझकर की गई देरी” और “लक्षित विभागीय प्रतिशोध” करार दिया।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता कैप्टन प्रमोद कुमार बजाज के साथ “गंभीर अन्याय और घोर मनमानी” की गई। अदालत ने कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर खोज-सह-चयन समिति का पुनर्गठन करे, जिसमें उस अधिकारी को शामिल न किया जाए, जो पहले याचिकाकर्ता के मामले में अवमानना कार्यवाही का सामना कर चुका है।

खंडपीठ ने सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि यह मामला “दुर्भावनापूर्ण कार्रवाइयों और लंबी प्रताड़ना से भरी लक्षित विभागीय प्रतिशोध की शर्मनाक कहानी” को दर्शाता है। अदालत ने कहा कि हर चरण पर याचिकाकर्ता की नियुक्ति में जानबूझकर बाधाएं डाली गईं, कभी मनगढ़ंत आरोप लगाकर तो कभी विभिन्न न्यायिक मंचों के आदेशों का पालन न करके।

कैप्टन प्रमोद कुमार बजाज पहले सेना में अधिकारी थे और सक्रिय सैन्य कार्रवाई के दौरान दिव्यांग हो गए। बाद में वह IRS में नियुक्त हुए। वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा जस्टिस की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने उन्हें ITAT में सदस्य (लेखा) पद के लिए ऑल इंडिया रैंक 1 पर रखा था। इसके बावजूद, केंद्र सरकार ने उनकी नियुक्ति नहीं की और खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट का हवाला दिया, जो बाद में निराधार पाई गई।

अदालत ने यह भी नोट किया कि वर्ष 2018 में पुनर्गठित चयन समिति द्वारा फिर से उनकी योग्यता की पुष्टि किए जाने के बावजूद, उनके खिलाफ सतर्कता कार्यवाही शुरू की गई, उन्हें 'एग्रीड लिस्ट' में डाला गया और रिटायरमेंट से कुछ महीने पहले अनिवार्य रिटायरमेंट दे दी गई। इस अनिवार्य रिटायरमेंट को सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2023 में रद्द करते हुए विभाग के आचरण पर कड़ी टिप्पणी की थी।

इसके बावजूद, 2024 में गठित चौथी चयन समिति में एक ऐसे सीनियर अधिकारी को शामिल किया गया, जो 2023 के आदेश की अवहेलना के कारण अवमानना कार्यवाही में तलब किए जा चुके थे। इस समिति ने भी याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी खारिज की, जिसके बाद उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

जस्टिस मेहता द्वारा लिखित फैसले में कहा गया कि चयन समिति में ऐसे अधिकारी की मौजूदगी से निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। इससे पक्षपात की उचित आशंका उत्पन्न होती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि चयन समिति का एक भी सदस्य पक्षपात के नियम से अयोग्य हो, तो पूरी चयन प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने चयन समिति की 1 सितंबर 2024 की बैठक का कार्यवृत्त रद्द करते हुए DoPT को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर नई चयन समिति की बैठक बुलाए और याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी पर पुनः विचार करे। साथ ही चार सप्ताह के भीतर 5 लाख रुपये की लागत राशि सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा कर याचिकाकर्ता को भुगतान करने का आदेश भी दिया गया।

अदालत ने कहा कि यह मामला न केवल व्यक्तिगत अन्याय का है, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता और कानून के शासन की बुनियादी अवधारणाओं से भी जुड़ा हुआ है।

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