NEET PG 2025: हमारा अंतःकरण संतुष्ट होना चाहिए- सुप्रीम कोर्ट ने NBEMS से कट-ऑफ घटाने के कारण बताने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (मेडिकल साइंस) से NEET PG 2025-26 के लिए पात्रता कट-ऑफ प्रतिशत घटाने के निर्णय पर हलफनामा दाखिल कर कारण स्पष्ट करने को कहा।
कोर्ट ने कहा कि इस निर्णय के पीछे कोई अनुचित या छिपा हुआ कारण नहीं होना चाहिए और इस बारे में न्यायालय का अंतःकरण संतुष्ट होना आवश्यक है।
जस्टिस पी. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ 13 जनवरी, 2026 को जारी उस नोटिस को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसके जरिए NBEMS ने NEET PG 2025-26 के तीसरे काउंसलिंग राउंड के लिए पात्रता कट-ऑफ प्रतिशत घटा दिया।
सुनवाई के दौरान जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि यह मामला परस्पर टकराते मूल्यों से जुड़ा है, जिनमें संतुलन जरूरी है।
उन्होंने कहा,
“एक तरफ यह चिंता है कि सीटें खाली न रह जाएं। दूसरी तरफ यह दबाव है कि उम्मीदवार नहीं आ रहे हैं, इसलिए कट-ऑफ कम किया जाए। फिर यह तर्क दिया जाएगा कि मानक गिराए जा रहे हैं। जवाब में कहा जाएगा कि सीटें खाली जा रही हैं। कहीं न कहीं संतुलन बनाना होगा।”
पीठ ने संकेत दिया कि कोर्ट यह परखेगी कि लिया गया निर्णय कहीं अत्यधिक गलत तो नहीं है।
जस्टिस नरसिम्हा ने कहा,
“हमारा अंतःकरण केवल यह सुनिश्चित करना चाहता है कि इसके पीछे कोई कपटपूर्ण कारण न हो, बस इतना ही।”
विवादित नोटिस के अनुसार, NEET PG 2025-26 के तीसरे राउंड की काउंसलिंग के लिए न्यूनतम पात्रता कट-ऑफ में भारी कमी की गई। सामान्य और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए कट-ऑफ 50वें पर्सेंटाइल (800 में से 276 अंक) से घटाकर 7वें पर्सेंटाइल (103 अंक) कर दी गई। सामान्य दिव्यांग श्रेणी के लिए यह 45वें पर्सेंटाइल (255 अंक) से घटाकर 5वें पर्सेंटाइल (90 अंक) की गई। वहीं अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग जिनमें दिव्यांग उम्मीदवार भी शामिल हैं, के लिए कट-ऑफ 40वें पर्सेंटाइल (235 अंक) से घटाकर शून्य पर्सेंटाइल यानी माइनस 40 अंक कर दी गई।
याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि नियमों के अनुसार न्यूनतम अंक तभी घटाए जा सकते हैं, जब पर्याप्त संख्या में उम्मीदवार उपलब्ध न हों।
उन्होंने कहा,
“नियम साफ कहते हैं कि जब पर्याप्त उम्मीदवार न हों तभी केंद्र सरकार राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग से परामर्श कर न्यूनतम अंक घटा सकती है।”
उन्होंने बताया कि करीब 80 हजार सीटें उपलब्ध हैं जबकि 1 लाख 28 हजार से अधिक उम्मीदवार 50वें, 45वें या 40वें पर्सेंटाइल के भीतर आते हैं।
उन्होंने कहा,
“तो फिर वे इसका जवाब दें। आप कट-ऑफ को माइनस 40 तक नहीं गिरा सकते। इसका मतलब यह हुआ कि जिसने परीक्षा दी ही नहीं उसकी स्थिति बेहतर हो जाएगी।”
शंकरनारायणन ने यह भी कहा कि स्नातकोत्तर स्तर पर मानक और कड़े होने चाहिए।
उन्होंने कहा,
“प्रीति श्रीवास्तव मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उच्च स्तर की पढ़ाई के लिए मानक ऊंचे होने चाहिए, कम नहीं।”
सुप्रीम कोर्ट ने NBEMS को निर्देश दिया कि वह पात्रता कट-ऑफ घटाने के निर्णय के पीछे के कारणों को स्पष्ट करते हुए हलफनामा दाखिल करे।
इससे पहले बुधवार को कोर्ट ने 13 जनवरी के नोटिस को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर नोटिस जारी किया।
याचिकाओं में कहा गया कि कट-ऑफ को असामान्य रूप से बेहद कम यहां तक कि शून्य और नकारात्मक अंकों तक घटा दिया गया है जो मनमाना है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करता है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पोस्ट ग्रैजुएट मेडिकल एजुकेशन में मानकों को कमजोर करना मरीजों की सुरक्षा, जनस्वास्थ्य और चिकित्सा पेशे की गरिमा के लिए खतरा है। साथ ही यह राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम 2019 के वैधानिक उद्देश्य के भी विपरीत है।