7 साल में सिर्फ 7 गवाह: सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू कश्मीर यूटी को लगाई फटकार, लंबित आपराधिक मामलों का ब्योरा तलब

Update: 2026-02-03 07:58 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश में आपराधिक मुकदमों की धीमी सुनवाई पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा है कि एक विचाराधीन कैदी को सात साल तक जेल में रखना और इस दौरान सिर्फ सात गवाहों की गवाही कराना संविधान के अनुच्छेद 21 और त्वरित सुनवाई के अधिकार का खुला उल्लंघन है।

कोर्ट ने इस मामले में आरोपी को जमानत देते हुए जम्मू-कश्मीर के गृह सचिव को अगली सुनवाई में ऑनलाइन पेश होने का निर्देश दिया m।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने यह भी आदेश दिया कि गृह सचिव उन सभी आपराधिक मामलों का विवरण रिकॉर्ड पर रखें, जिनमें आरोपी पांच साल से अधिक समय से हिरासत में हैं और ट्रायल लंबित है।

यह मामला एक हत्या के आरोपी से जुड़ा है जिसने जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। 29 जनवरी को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और अभियोजन एजेंसी से देरी को लेकर स्पष्टीकरण मांगा था।

सोमवार को जब रिपोर्ट पेश की गई तो कोर्ट ने अभियोजन की कार्यप्रणाली को बेहद निराशाजनक बताया।

सुनवाई की शुरुआत में जब जम्मू-कश्मीर प्रशासन के वकील ने कहा कि उन्हें मामले के सभी आदेश नहीं मिल पा रहे हैं तो जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि कुल 86 आदेश हैं।

इस पर जस्टिस पारदीवाला ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा,

“क्या यह मजाक है आपने अनुच्छेद 21 और त्वरित सुनवाई की अवधारणा का मजाक बना दिया। सात साल से यह व्यक्ति जेल में क्यों है? यह उसके मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है।”

जब देरी के लिए कोविड महामारी का हवाला दिया गया तो जस्टिस पारदीवाला ने सवाल किया कि क्या पूरे देश में महामारी के दौरान सभी ट्रायल पूरी तरह ठप हो गए। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि 2022 के बाद से अब तक ट्रायल में कोई वास्तविक प्रगति नहीं हुई।

कोर्ट के आदेश में कहा गया कि आरोपी को अक्टूबर, 2018 में दर्ज हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया। फरवरी, 2019 में आरोप तय हुए लेकिन सात साल में अभियोजन सिर्फ सात गवाहों की ही गवाही करा सका है, जबकि अभी भी 17 गवाहों की सूची बाकी है। हैरानी की बात यह रही कि 82 से अधिक सुनवाइयों में एक भी गवाह पेश नहीं किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट की रिपोर्ट अभियोजन एजेंसी की बदहाल स्थिति को उजागर करती है। इस देरी के लिए राज्य को जवाब देना होगा। कोर्ट ने निर्देश दिया कि चार सप्ताह के भीतर गृह सचिव इस संबंध में जवाब दाखिल करें और अगली सुनवाई में ऑनलाइन उपस्थित रहें।

कोर्ट ने इस बीच आरोपी को ट्रायल कोर्ट द्वारा तय शर्तों पर जमानत देने का आदेश दिया।

सुनवाई के अंत में आरोपी के वकील ने कोर्ट को यह भी बताया कि यह कोई अकेला मामला नहीं है बल्कि जम्मू-कश्मीर में सैकड़ों ऐसे विचाराधीन कैदी हैं, जो 10 साल या उससे अधिक समय से जेल में हैं और उनके मुकदमे अब तक लंबित हैं।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता जताते हुए इसे अकल्पनीय बताया और सभी ऐसे मामलों का ब्योरा तलब किया।

मामले में आरोपी पर एक महिला ट्रक चालक की हत्या का आरोप है।

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