दोस्त को डूबते देखकर भागना निंदनीय, लेकिन इससे अकेले हत्या साबित नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी दोस्त को नदी में डूबते हुए देखने के बाद मौके से भाग जाना और उसके परिवार को घटना की जानकारी नहीं देना निंदनीय आचरण हो सकता है, लेकिन केवल इस आधार पर इसे हत्या का आपराधिक सबूत नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि ऐसे आचरण से अपने आप यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि व्यक्ति ने हत्या की।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने नदी में डूबने से हुई एक व्यक्ति की मौत के मामले में हत्या के दोषी ठहराए गए दो लोगों को बरी कर दिया।
अदालत ने पाया कि मामले में दोनों आरोपियों के अलावा ऐसा कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था, जिसने मृतक को आखिरी बार उनके साथ देखा हो।
मामला 17 जुलाई 2006 का है। मृतक को सुबह-सुबह उसके घर से यह कहकर ले जाया गया था कि वह अंकलेश्वर में वॉलीबॉल खेलने जा रहा है। वह शाम तक घर नहीं लौटा। बाद में नदी के किनारे उसके कपड़े और अन्य सामान मिले और अगले दिन उसका शव बरामद किया गया। शव के पोस्टमार्टम में मौत का कारण डूबने से सांस और हृदय की क्रिया रुकना बताया गया।
अभियोजन का आरोप था कि दोनों आरोपियों ने अपने दोस्त की हत्या की और फिर अपराध छिपाने की कोशिश की। निचली अदालत ने दोनों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 34 और 201 के साथ धारा 120-बी के तहत दोषी ठहराते हुए हत्या के लिए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने भी उनकी सजा बरकरार रखी थी।
अभियोजन ने आरोपियों के घटना के बाद के आचरण को उनके खिलाफ महत्वपूर्ण परिस्थिति बताया था। उसका कहना था कि घटना के बाद दोनों मौके से चले गए, फिल्म देखने गए और मृतक के परिवार को तुरंत घटना की जानकारी नहीं दी। अभियोजन ने इसे हत्या के बाद अपराध छिपाने की कोशिश के तौर पर पेश किया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
जस्टिस के. विनोद चंद्रन की ओर से लिखे गए फैसले में कहा गया कि आरोपियों का चुप रहना और मृतक के परिवार को जानकारी नहीं देना अपने आप में आपराधिक परिस्थिति नहीं माना जा सकता, क्योंकि दुर्घटना में किसी व्यक्ति के डूबने की स्थिति में ऐसा आचरण मानवीय रूप से संभव है।
अदालत ने कहा,
“आरोपियों का चुप रहना और मृतक के परिवार को सूचना न देना आपराधिक परिस्थिति नहीं माना जा सकता, क्योंकि डूबने की दुर्घटना होने पर भी यह एक संभावित मानवीय आचरण हो सकता है।”
पीठ ने यह भी पाया कि चिकित्सकीय साक्ष्य हत्या की पुष्टि नहीं करते। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण डूबने से दम घुटना बताया गया था और डॉक्टर की गवाही से भी यह साबित नहीं हुआ कि मौत हत्या के कारण हुई।
मृतक के शरीर पर तीन चोटें मिली थीं लेकिन डॉक्टर ने कहा था कि ये चोटें नदी में नहाते समय लग सकती थीं या पानी के बहाव में शव किसी कठोर वस्तु से टकराने के कारण भी हो सकती थीं।
अदालत ने कहा कि ऐसा कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि मृतक के सिर पर वार कर उसे बेहोश किया गया और जानबूझकर नदी में डुबोया गया।
अभियोजन ने घटनास्थल से मिली टूटी हुई सोडा की बोतल को भी हत्या की कहानी के समर्थन में इस्तेमाल करने की कोशिश की थी।
उसका दावा था कि मृतक के सिर पर कांच की बोतल से वार किया गया हो सकता है। लेकिन अदालत ने पाया कि घटनास्थल से कोई टूटी हुई बोतल या खून से सने कांच के टुकड़े बरामद नहीं किए गए थे और न ही उन्हें फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले की परिस्थितियां हत्या के बजाय दुर्घटनावश डूबने की संभावना को अधिक मजबूत करती हैं।
अदालत ने माना कि आरोपियों का मौके से भागना और डूब रहे दोस्त को बचाने के लिए मदद के लिए नहीं पुकारना निंदनीय था, लेकिन इससे हत्या साबित नहीं होती।
अदालत ने कहा,
“दोस्त को डूबते हुए देखने के बाद उनका फिल्म देखने चले जाना निंदनीय है, लेकिन इसे डूबने के बजाय हत्या साबित करने वाली आपराधिक परिस्थिति नहीं माना जा सकता। निर्दोष होने की संभावना स्पष्ट है और परिस्थितियां पूर्व नियोजित हत्या के बजाय दुर्घटना की ओर संकेत करती हैं।”
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आरोपियों की अपील मंजूर करते हुए उनकी दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि किसी अन्य मामले में उनकी जरूरत नहीं है तो उन्हें रिहा कर दिया जाए।