झारखंड न्यायिक सेवा परीक्षा के 35 अभ्यर्थियों की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने निष्प्रभावी होने पर निपटाई
सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड न्यायिक सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2023 की संशोधित मेरिट लिस्ट से बाहर किए गए 35 अभ्यर्थियों की याचिका को निष्प्रभावी (infructuous) होने के कारण निपटा दिया। कोर्ट को बताया गया कि संबंधित पूरी परीक्षा ही रद्द कर दी गई है।
चीफ़ जस्टिस जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने यह आदेश पारित किया।
याचिका शुभेंदु मिश्रा और अन्य ने झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) द्वारा 5 जून 2026 को जारी संशोधित प्रारंभिक परीक्षा परिणाम-सह-मेरिट लिस्ट को चुनौती देते हुए दायर की थी। याचिकाकर्ताओं को पहले 2 जुलाई 2024 की मेरिट लिस्ट में सफल घोषित किया गया था, लेकिन संशोधित सूची में उन्हें बाहर कर दिया गया।
यह परीक्षा 10 मार्च 2024 को सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के 138 पदों पर भर्ती के लिए आयोजित की गई थी। प्रारंभिक परीक्षा की मॉडल आंसर-की में JPSC ने तीन बार संशोधन किया था और 2 जुलाई 2024 को जारी परिणाम में करीब 1,797 उम्मीदवारों को सफल घोषित किया गया था।
आंसर-की को लेकर विवाद तीन प्रश्नों से जुड़ा था। झारखंड हाईकोर्ट ने इन तीनों प्रश्नों के उत्तरों को गलत मानते हुए अंकों की दोबारा गणना और नई मेरिट लिस्ट तैयार करने का निर्देश दिया था।
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने पर 9 फरवरी 2026 को कोर्ट ने कहा था कि हाईकोर्ट स्वयं को 'सुपर-एग्जामिनर' या विषय विशेषज्ञ नहीं मान सकता। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति को विवादित प्रश्नों की दोबारा जांच कर अपनी राय JPSC को भेजने का निर्देश दिया था।
इसके बाद JPSC ने 1 जून 2026 को अंतिम आंसर-की जारी की। इसमें दो विवादित प्रश्न हटा दिए गए और एक प्रश्न का उत्तर बदला गया। इसके आधार पर अंकों की दोबारा गणना कर 5 जून 2026 को संशोधित मेरिट लिस्ट जारी की गई, जिसमें याचिकाकर्ताओं को बाहर कर दिया गया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे पहले ही प्रारंभिक परीक्षा में सफल घोषित हो चुके थे और अगले चरण के लिए दस्तावेज जमा कर चुके थे। उनका तर्क था कि आंसर-की में सुधार के बाद की गई प्रक्रिया से पहले से सफल उम्मीदवारों को बाहर नहीं किया जाना चाहिए।
हालांकि, अब चूंकि पूरी न्यायिक सेवा प्रारंभिक परीक्षा ही रद्द कर दी गई है, इसलिए संशोधित मेरिट लिस्ट को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला देने का कोई प्रभावी उद्देश्य नहीं बचा। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को निष्प्रभावी मानते हुए निपटा दिया।